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गाजियाबाद। केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में तर्क सबसे बड़ा आचार्य विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया।य़ह कोरोना काल से 771 वां वेबीनार था। वैदिक प्रवक्ता अतुल सहगल ने विषय की भूमिका प्रस्तुत करते हुए, मानव उन्नति के परिपेक्ष में इस विषय की महत्ता को सामने रखा। आजकल समाज में तर्क,वितर्क और कुतर्क बहुत प्रचलित है।
वक्ता ने तर्क को ऋषि समान बताया
दरअसल, प्रायः तर्क का नाम लेकर नास्तिकता का समर्थन किया जाता है अथवा उसको बढ़ावा दिया जाता है। तर्क के महत्त्व को वैदिक विचारधारा के बड़े परिपेक्ष में ही पूर्णता से समझा जा सकता है। तर्क सत्य को जानने का साधन है। वास्तव में तर्क विवेकपूर्ण व्यवहार का आधार है। तर्क बुद्धि के सही और पूर्ण प्रयोग का नाम है। वक्ता ने तर्क को ऋषि समान बताया। वक्ता ने प्रसिद्ध विद्वानों के तर्क के विषय पर वक्तव्य प्रस्तुत किए। इनमें महर्षि गौतम प्रमुख हैं जो न्यायदर्शन के प्रणेता थे।
अनुभव के आधार पर जीवनुपयोगी ज्ञान
आधुनिक विद्वानों में स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द और आचार्य रजनीश (ओशो ) के तर्क विषय पर विचार वक्ता ने सामने रखे। वक्ता ने तत्पश्चात न्यायदर्शन के सूक्त संख्या 40 को उद्धरित करते हुए तर्क की मौलिक परिभाषा प्रस्तुत की और तर्क को शंका समाधान का साधन बताया। वक्ता ने इस विषय पर अपने स्वयं के विश्लेषण और अनुभव के आधार पर जीवनुपयोगी ज्ञान और व्यवहार बिंदु बताए और उनकी चर्चा की।
अधर्म के अंश जुड़ गए
वक्ता ने तर्क को सत्य, असत्य और अर्धसत्य का बोथ करने का साधन बताया।इसके साथ ही वक्ता ने यह भी कहा कि तर्क को धर्म के साथ जोड़ के ही सुख, सफलता, शांति व उन्नति संभव है।यदि इसके साथ अधर्म के अंश जुड़ गए तो यही तर्क कुतर्क बन जाता है और अकल्याण का कारण बनता है। संसार के रचयिता परमेश्वर ने भी तर्क के आधार पर प्राणियों की रचना की। यही तर्क सृष्टि के संचालन और विनाश का कारण भी बनता है। कुछ नास्तिक लोग तर्क के नाम पर अपने अनुचित कार्यों को सही ठहराने का प्रयास करते हैं, लेकिन वे अंधकार में जीते हैं।
सत्य और धर्म का मार्गगामी बनता है
जब मनुष्य अपने विवेक को प्रबल कर, बुद्धिपूर्वक विचारता है व अन्य कार्य करता है तो सत्य और धर्म का मार्गगामी बनता है। वह अपना व अन्य प्राणियों का उद्धार करता हुआ अपनी उन्नति के शिखर बिंदु - मोक्ष की दिशा में तीव्रता से बढ़ता है। परन्तु काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद से ग्रस्त होने से मनुष्य तार्किक बुद्धि नहीं बना पाता और असत्य-अधर्म में लिप्त हो जाता है। यह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। वक्ता ने अपने प्रवचन में सत्य जानने हेतु चार प्रमाणों (प्रत्यक्ष,अनुमान,उपमान और शब्द) का भी उल्लेख किया और तर्क को सत्य का बोध करने का प्रमुख व्यवहारिक साधन बताते हुए इसको विज्ञान के विकास का उपकरण कहा।
ये रहें मोजूद
मुख्य अतिथि सुधीर बंसल व अध्यक्ष राजश्री यादव ने भी अपने विचार व्यक्त किए। परिषद अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन किया व प्रदेश अध्यक्ष प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापन किया। गायिका कौशल्या अरोड़ा, जनक अरोड़ा, बिन्दु मदान, कुसुम भंडारी, रविन्द्र गुप्ता, प्रवीना ठक्कर आदि के मधुर भजन हुए।




