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चिम्पांजियों का ग्रुप बना एक दूसरे के जान का प्यासा, सगे भाइयों में छिड़ी जंग! पढ़ें दिलचस्प खबर

Aryan
10 April 2026 8:30 PM IST
चिम्पांजियों का ग्रुप बना एक दूसरे के जान का प्यासा, सगे भाइयों में छिड़ी जंग! पढ़ें दिलचस्प खबर
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यह स्टडी मानवीय सामूहिक हिंसा के मौजूदा मॉडलों के फिर से मूल्यांकन किए जाने पर जोर देता है।

नई दिल्ली। एक ओर जहां पूरी दुनिया ईरान-इजराइल और अमेरिका के जंग पर नजरें टिकाए हुए है। लेकिन अफ्रीका के यूगांडा में चिंपांजियों के बीच गृह युद्ध छिड़ा हुआ है। दरअसल यहां के किबाले नेशनल पार्क में Ngogo नाम के एक चिंपांजी का समूह है। पहले यह दुनिया का सबसे बड़ा जंगली चिंपांजी समूह था। इस ग्रुप में चिंपांजियों की संख्या करीब 200 थी। वहीं, अब कई सालों तक वैज्ञानिकों की स्टडी के बाद सच सामने आया है। जानकारी के मुताबिक, शुरुआत में मिलजुल कर रहने वाले और जीने वाले चिंपांजी एब एक-दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। इस घटना में सगे भाइयों के बीच जंग हुआ।

दो गुटों में बंटा पांजियों का ग्रुप

30 साल से चल रही स्टडी के बाद वैज्ञानिकों को पता चला कि यह ग्रुप दो गुटों में बंट गया और इनके बीच सिविल वार सी छिड़ गई। वैज्ञानिकों ने इनके व्यवहार पर स्टडी कर इन्हें दो ग्रुप में बांटा, जिसमें एक को सेंट्रल और दूसरे को वेस्टर्न ग्रुप नाम दिया गया। दोनों ग्रुप्स के बीच यह लड़ाई इतनी अधिक बढ़ गई कि अब तक 20 से अधिक बड़े और चिंपांजियों के 25 से अधिक बच्चे मारे गए हैं।

स्टडी के लेखकों ने दी जानकारी

इंसानियत के सबसे करीबी होने के नाते चिंपांजी और उनके सामाजिक मेलजोल हमें अपने समाजों में ‘युद्ध’ और ‘शांति’ की विकासवादी जड़ों को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एट ऑस्टिन के विकासवादी मानवविज्ञानी एरॉन सैंडेल के नेतृत्व में इस स्टडी के लेखकों ने बताया कि आज इंसानों में होने वाले ध्रुवीकरण और युद्ध को जातीय, धार्मिक या राजनीतिक विभाजनों से जोड़कर देखना स्वाभाविक लगता है।

1970 के दशक में तंजानिया में भी चिंपांजियों का समुदाय बंटा था

यह स्टडी मानवीय सामूहिक हिंसा के मौजूदा मॉडलों के फिर से मूल्यांकन किए जाने पर जोर देता है। स्टडी में जुटाए गए फैक्ट्स के मुताबिक, 1970 के दशक में दिवंगत प्राइमेटोलॉजिस्ट जेन गुडॉल ने तंजानिया में चिंपांजियों के एक समुदाय को दो विरोधी गुटों में बंटते हुए देखा था, जिसके रिजल्ट के तौर पर चार साल तक जानलेवा लड़ाई चली थी।


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