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एक ऐसा मंदिर जहां दी जाती थी अंग्रेजों की बलि! जानें इस मंदिर से जुड़ी रहस्यमय बातें

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित तरकुलहा देवी मंदिर पूर्वांचल क्षेत्र में प्रमुख आस्था का केंद्र माना जाता है। घने तारकूल के पेड़ों से घिरे इस प्राचीन शक्ति-पीठ को लेकर क्षेत्र में ऐसी मान्यताएं प्रचलित हैं, जिसकी वजह से हर साल लाखों श्रद्धालु यहां मत्था टेकने आते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस स्थान पर देवी स्वयं प्रकट हुई थीं और तब से यह स्थल सिद्ध शक्तियों और तांत्रिक साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, एक सिद्ध योगी जिन्हें कई परंपराओं में बाबा गोरखनाथ बताया गया है, उन्होंने इसी स्थान पर तपस्या की थी। यहां की एक और कथा भी प्रचलित है कि वीर शहीद ने अंग्रेजों की बलि इस जगह पर दी थी। दरअसल तरकुलहा देवी की कहानी अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह से भी जुड़ी हुई है।
अंग्रेजों का सिर काटकर मां के पास
शहीद बंधू सिंह आजादी के काल में अंग्रेजों का सिर काट कर माता की सिद्ध पीठ पर चढ़ाते थे। पकड़े जाने पर अंग्रेजों ने बंधु सिंह को फांसी दी थी। मां तरकुलहा देवी का दर्शन करने के लिए यूपी ही नहीं बल्कि देश भर से श्रद्धालु यहां आते हैं। नवरात्र में यहां काफी भीड़ उमड़ती है। चैत्र नवरात्र के समय यहां मेला लगता है। यहां दूर-दूर से मां के दर्शन करने लोग आते हैं।
बंधू सिंह सच्चे देशभक्त थे
अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह सच्चे देश भक्त थे। मां तरकुलहा देवी को सिद्ध पीठ के रूप में पहचान दिलाने वाले बाबू बंधू सिंह ही थे। डुमरी रियासत के बाबू शिव प्रताप सिंह के पुत्र अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह ने स्वाधीनता की पहली ही लड़ाई में अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था।
बाबू बंधू सिंह के नाम से कांपते थे अंग्रेज
बाबू बंधू सिंह का आतंक इतना था कि अंग्रेज उनके नाम से कांपते थे। बाबू बंधू सिंह ने आजादी की लड़ाई के लिए अपना राज पाठ कुर्बान कर दिया था। बंधू सिंह तरकुलहा सिद्ध पीठ के पास ही घने जंगलों में ही रहते थे। इस सिद्ध पीठ की प्रसिद्धि की कहानी डुमरी रियासत के बाबू शिव प्रताप के पुत्र बाबू बंधू सिंह से जुड़ी हुई है।
धोखे से किया गया गिरफ्तार
काफी कोशिश के बाद अंग्रेजों ने उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर फांसी की सजा दी। जानकारी के मुताबिक, कि अंग्रेज जब बंधू सिंह को फांसी दे रहे तो बार-बार फांसी का फंदा टूट जाता था। लेकिन बार-बार वह बंधू सिंह को फांसी पर चढ़ाते थे और फांसी टूट जाती थी। बहुत प्रयास के बाद भी अंग्रेज उन्हें फांसी नहीं दे सके।




