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'हिंदी थोपने' की बहस के बीच कर्नाटक में हिंदी का जलवा! 93% छात्रों ने तीसरी भाषा के रूप में चुना, जानें कौन-कौन भाषा रह गई पीछे

Anjali Tyagi
8 April 2026 4:00 PM IST
हिंदी थोपने की बहस के बीच कर्नाटक में हिंदी का जलवा! 93% छात्रों ने तीसरी भाषा के रूप में चुना, जानें कौन-कौन भाषा रह गई पीछे
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नई दिल्ली। देश में भाषा को लेकर हमेशा ही विवाद बना रहता है। इन भाषाएं और स्वतंत्रता के बावजूद लोगों में हमेशा भाषाई बहस जारी रहती है। ऐसे में भारत का राज्य कर्नाटक में भी 'हिंदी थोपने' का विवाद रहा है। हालांकि इसी बीच एक रोचक तथ्य सामने आया है। दरअसल शैक्षणिक सत्र (2025-26) में राज्य बोर्ड के लगभग 93% छात्रों ने तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को चुना है। इस मामले में कन्नड़-अंग्रेजी भी पीछे रह गई है।

छात्रों की पसंद बनी हिंदी

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, तीसरी भाषा चुनने वाले करीब 8.1 लाख छात्रों में से 7.5 लाख से अधिक छात्रों ने हिंदी को प्राथमिकता दी है। इसकी तुलना में कन्नड़ को तीसरी भाषा के रूप में चुनने वाले छात्रों की संख्या लगभग 11,400 और अंग्रेजी चुनने वालों की संख्या 32,000 रही है।

सरकार ने नीति में किया बदलाव

कर्नाटक सरकार ने हाल ही में SSLC (कक्षा 10) की परीक्षाओं के लिए एक बड़ा बदलाव किया है। दरअसल पहले SSLC (कक्षा 10वीं) में तीसरी भाषा के 100 अंक कुल 625 अंकों में जुड़ते थे, जिससे छात्रों पर अतिरिक्त दबाव रहता था। लेकिन अब सरकार ने इसे बदलकर ग्रेडिंग सिस्टम लागू कर दिया है। जिसके अनुसार अब नई व्यवस्था के तहत तीसरी भाषा अब फाइनल रिजल्ट में शामिल नहीं होगी, बल्कि छात्रों को A, B, C और D ग्रेड दिए जाएंगे।

कन्नड़-अंग्रेजी भी पीछे

जानकारी के मुताबिक इन आकड़ों ने सभी को चौंका दिया है। छात्रों ने पंसद के मामले में कन्नड़-अंग्रेजी को भी पीछे छोड़ दिय है। दुनिया भर में अंग्रेजी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इसमें इंग्लिश को 32,135 छात्र, कन्नड़ को 11,483 छात्र, उर्दू को 5,544 छात्र, संस्कृत को 5,159 छात्र, अरबी को 361 छात्र ने पंसद किया। वहीं क्षेत्रीय भाषाओं की स्थिति और भी कमजोर रही. तुलु को 845 छात्रों ने चुना, कोंकणी को सिर्फ 34 और मराठी को केवल 3 छात्रों ने अपनाया। इससे साफ है कि हिंदी के सामने बाकी भाषाओं की मांग बहुत कम है।

छिड़ा हुआ है विवाद

इस नीतिगत बदलाव को लेकर राज्य में बहस छिड़ी हुई है। कुछ संगठन इसे "हिंदी के महत्व को कम करने" का प्रयास बता रहे हैं, जबकि कन्नड़ समर्थक समूहों और राज्य सरकार का तर्क है कि छात्रों पर अतिरिक्त भाषा का बोझ नहीं डालना चाहिए। सरकार अब धीरे-धीरे राज्य में द्विभाषी मॉडल (मुख्यतः कन्नड़ और अंग्रेजी) की ओर बढ़ने का संकेत दे रही है, जिससे भविष्य में तीसरी भाषा की अनिवार्यता पूरी तरह खत्म हो सकती है।

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