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क्या अकाल मृत्यु को रोका जा सकता है? आत्मा को कैसे मिलती है मुक्ति, गरुड़ पुराण में छिपा है जवाब

Anjali Tyagi
29 Jan 2026 8:00 AM IST
क्या अकाल मृत्यु को रोका जा सकता है? आत्मा को कैसे मिलती है मुक्ति, गरुड़ पुराण में छिपा है जवाब
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नई दिल्ली। गरुड़ पुराण हिंदू धर्म के उन महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है, जो जीवन, मृत्यु और उसके बाद के सफर का विस्तार से वर्णन करता है. अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या अकाल मृत्यु यानी समय से पहले मौत को टाला जा सकता है और भटकती आत्मा को मुक्ति कैसे मिलती है? हिंदू धर्मशास्त्रों, विशेषकर गरुड़ पुराण, के अनुसार अकाल मृत्यु और आत्मा की मुक्ति से जुड़ी कई कहानियां है।

क्या अकाल मृत्यु रोकी जा सकती है?

शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु अटल है, लेकिन अकाल मृत्यु (दुर्घटना, आत्महत्या या अचानक बीमारी) को कुछ विशेष उपायों से टाला जा सकता है:

महामृत्युंजय मंत्र का जाप: ऋग्वेद और अथर्ववेद में वर्णित इस मंत्र को 'मृत्यु पर विजय' प्राप्त करने वाला माना गया है। इसका नियमित जाप अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा करता है।

पुण्य और दान: शिव पुराण के अनुसार, मृत्यु से 6 महीने पहले ही संकेत मिलने लगते हैं। इस दौरान किए गए विशेष पुण्य कार्य और दान काल को टालने में सहायक हो सकते हैं।

ईश्वर भक्ति: भगवान शिव या श्री कृष्ण की अनन्य भक्ति भाग्य में लिखे अमंगल और अकाल मृत्यु के योग को नष्ट कर सकती है।

अकाल मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति

गरुड़ पुराण कहता है कि अकाल मृत्यु होने पर आत्मा को तुरंत नया शरीर या परलोक में स्थान नहीं मिलता:

प्रेत योनि में वास: क्योंकि व्यक्ति का प्राकृतिक जीवनकाल पूरा नहीं हुआ होता और सांसारिक इच्छाएं अधूरी रह जाती हैं, इसलिए आत्मा प्रेत योनि में भटकती रहती है।

भटकाव का समय: ऐसी आत्मा तब तक भटकती है जब तक उसका निर्धारित समय (प्राकृतिक आयु) समाप्त नहीं हो जाता।

आत्मा को मुक्ति दिलाने के उपाय

यदि किसी परिजन की अकाल मृत्यु हुई है, तो उसकी शांति और मुक्ति के लिए ये विधान बताए गए हैं:

नारायण बलि: अकाल मृत्यु वाली आत्मा की शुद्धि और शांति के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य अनुष्ठान माना गया है।

गया श्राद्ध एवं पिंडदान: गया जी जैसे तीर्थों में विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण करने से आत्मा को पितृ लोक में स्थान मिलता है।

श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ: विशेषकर गीता के तीसरे अध्याय (कर्म योग) का पाठ और उसका फल मृत आत्मा को अर्पित करने से उन्हें दुर्गति से मुक्ति मिलती है।

नियमित प्रार्थना: प्रतिदिन घर में दीपक जलाकर उस आत्मा के नाम से 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करना और अमावस्या को तर्पण करना लाभकारी होता है।

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