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Death Anniversary: मैं आजाद हूं, आजाद रहूंगा... आखिर क्यों चंद्रशेखर आजाद को ब्रिटिश पुलिस जिंदा नहीं पकड़ पाई?

Anjali Tyagi
27 Feb 2026 11:18 AM IST
Death Anniversary: मैं आजाद हूं, आजाद रहूंगा... आखिर क्यों चंद्रशेखर आजाद को ब्रिटिश पुलिस जिंदा नहीं पकड़ पाई?
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नई दिल्ली। आज पूरा देश चंद्रशेखर आजाद की शहादत का दिन मना रहा है। बता दें कि 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (अब चंद्रशेखर आज़ाद पार्क) में ब्रिटिश पुलिस चंद्रशेखर आज़ाद को इसलिए ज़िंदा नहीं पकड़ पाई क्योंकि उन्होंने अंतिम सांस तक हार न मानने और "आज़ाद" रहने की अपनी प्रतिज्ञा को निभाया था।

कौन थे आजाद?

चंद्रशेखर आज़ाद (1906–1931) भारत के एक महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया। वे अपनी अटूट देशभक्ति और इस प्रतिज्ञा के लिए जाने जाते थे कि वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं आएंगे। उनका जन्म चंद्रशेखर तिवारी के रूप में हुआ था। 15 साल की उम्र में गिरफ्तार होने पर जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने अपना नाम 'आज़ाद', पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और घर 'जेल' बताया। तब से वे 'आजाद' कहलाए। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के मुख्य रणनीतिकार और कमांडर-इन-चीफ थे। उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन किया।

ब्रिटिश पुलिस की विफलता और आज़ाद की शहादत के कारण

पुलिस से घिरने के बाद आज़ाद ने अकेले ही डटकर मुकाबला किया। जब उनकी पिस्तौल में केवल एक गोली बची, तो उन्होंने अंग्रेजों के हाथों बंदी बनने के बजाय खुद को गोली मार ली। मुठभेड़ के दौरान उन्होंने अपने साथी सुखदेव राज को सुरक्षित बाहर निकलने का मौका दिया और खुद पुलिस का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। आज़ाद की वीरता का ऐसा खौफ था कि उनके शहीद होने के बाद भी पुलिस उनके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह वास्तव में मृत हैं, उनके शरीर पर गोलियाँ चलाने के बाद ही पास जाने का साहस किया। ब्रिटिश पुलिस लंबे समय तक उन्हें इसलिए भी नहीं पकड़ सकी क्योंकि उनके पास आज़ाद की कोई आधिकारिक पहचान फोटो नहीं थी और वे वेश बदलने में अत्यंत कुशल थे। आज, 27 फरवरी 2026 को उनकी 95वीं पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें नमन कर रहा है।

चंद्रशेखर आज़ाद का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वीरता का एक अद्वितीय उदाहरण है। उनकी स्मृति को सम्मान देने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए गए हैं:

स्मारक

जिस स्थान पर उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी थी, उस अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर अब 'चंद्रशेखर आज़ाद पार्क' कर दिया गया है। वहां उनकी एक भव्य प्रतिमा स्थापित है, जो आज भी युवाओं को देशभक्ति की प्रेरणा देती है।

संग्रहालय

प्रयागराज स्थित इलाहाबाद संग्रहालय में उनसे जुड़ी कई ऐतिहासिक वस्तुएं सहेज कर रखी गई हैं, जो उनके संघर्षपूर्ण जीवन और साहस की गवाही देती हैं।

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