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स्थापना दिवस : एक वैचारिक यात्रा कैसे बनी भाजपा? जानें संघर्ष से सत्ता तक बीजेपी की पूरी कहानी

Anjali Tyagi
6 April 2026 10:55 AM IST
स्थापना दिवस : एक वैचारिक यात्रा कैसे बनी भाजपा? जानें संघर्ष से सत्ता तक बीजेपी की पूरी कहानी
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नई दिल्ली। आज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपना 47वां स्थापना दिवस मना रही है। इस विशेष अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और जेपी नड्डा सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कार्यकर्ताओं को शुभकामनाएं दी हैं। ऐसे में ,वाल उठता है कि इस पार्टी की शुरुआत कैसे हुई। बता दें कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की स्थापना की कहानी भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण मोड़ से जुड़ी है, जिसकी शुरुआत 1951 के भारतीय जनसंघ से होती है।

भाजपा के गठन की यात्रा

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की। 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के विरोध में, जनसंघ ने अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर जनता पार्टी में अपना विलय कर लिया। 1977 के चुनावों में जनता पार्टी ने जीत हासिल की और केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

विवाद का कारण

जनता पार्टी के भीतर 'दोहरी सदस्यता' को लेकर आंतरिक कलह शुरू हो गई। पार्टी के कुछ नेता इस बात पर अड़े थे कि जनसंघ के सदस्य एक साथ जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) दोनों के सदस्य नहीं रह सकते। दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर समझौता न होने के कारण जनसंघ के पूर्व सदस्यों ने जनता पार्टी से अलग होने का फैसला किया। 6 अप्रैल 1980 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में आयोजित एक सम्मेलन में भारतीय जनता पार्टी की औपचारिक घोषणा की गई। अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी का पहला अध्यक्ष चुना गया। उनके साथ लालकृष्ण आडवाणी और सूरज भान जैसे नेता भी मुख्य भूमिका में थे।

चुनाव चिन्ह

शुरुआत में पार्टी ने 'चक्र' और 'हाथी' चिन्ह की मांग की थी, लेकिन चुनाव आयोग ने उन्हें 'कमल' का फूल आवंटित किया। 1984 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को केवल 2 सीटें मिली थीं, लेकिन आज यह दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन चुकी है।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का योगदान

भारतीय जनसंघ के संस्थापक: डॉ. मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद, उन्होंने एक ऐसे राजनीतिक विकल्प की नींव रखी जो भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद पर आधारित हो। उन्होंने "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे" का नारा दिया और कश्मीर के विशेष दर्जे (अनुच्छेद 370) के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपना बलिदान दिया।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का योगदान

उपाध्याय जी ने 'एकात्म मानववाद' का दर्शन दिया, जो आज भी भाजपा की आधिकारिक विचारधारा है। यह दर्शन पूंजीवाद और समाजवाद दोनों के विकल्प के रूप में मानवीय गरिमा और भारतीय मूल्यों की बात करता है। उन्होंने 'अंत्योदय' यानी समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान का संकल्प दिया, जो वर्तमान सरकार की कई योजनाओं का आधार है। जनसंघ के महासचिव के रूप में, उन्होंने पार्टी को एक मजबूत कैडर-आधारित संगठन बनाया, जिससे वैचारिक प्रतिबद्धता को चुनावी सफलता से ऊपर रखा गया।

भाजपा के वैचारिक आधार

भाजपा की विचारधारा में राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक एकता और 'अंत्योदय' मुख्य हैं, जिसके सूत्रधार दीनदयाल उपाध्याय थे। आज यह 'सेवा, सुशासन और गरीब कल्याण' के मूल मंत्र के साथ काम कर रही है।

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