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ना झूकूंगी, ना ही टूटूगी... मैं बस लडूंगी! एसिड अटैक सर्वाइवर से पद्मश्री तक, प्रो. मंगला कपूर की प्रेरक कहानी

नई दिल्ली। प्रो. मंगला कपूर की कहानी केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि अदम्य साहस और जीत की महागाथा है। उन्हें 2026 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। आज भी प्रो. कपूर अपने घर पर छात्र-छात्राओं को बिना किसी शुल्क के संगीत की शिक्षा देती हैं और दिव्यांग बच्चों के कल्याण के लिए कार्य कर रही हैं।
कौन हैं प्रोफेसर मंगला कपूर?
प्रोफेसर मंगला कपूर भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक प्रतिष्ठित विदुषी हैं, जिनका जीवन साहस, साधना और संकल्प का अद्भुत उदाहरण है। वे न केवल एक श्रेष्ठ संगीत शिक्षिका और शोधकर्ता हैं, बल्कि एक एसिड अटैक सर्वाइवर भी हैं। जिन्होंने अपने जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों को संगीत की शक्ति से पराजित किया।
बचपन का भयावह हादसा
वर्ष 1965 में, जब मंगला केवल 11-12 वर्ष की थीं, उन पर एक व्यापारिक रंजिश के कारण तेजाब से हमला किया गया था। इस हमले ने न केवल उनका चेहरा बिगाड़ दिया, बल्कि उन्हें गहरा मानसिक आघात भी पहुँचाया। इस हमले के बाद उन्होंने लगभग 6 साल अस्पतालों में बिताए और उनके चेहरे व शरीर की करीब 36-37 सर्जरी की गईं।
संगीत बना सहारा
डॉक्टरों की सलाह पर उन्होंने अवसाद से लड़ने के लिए संगीत को अपनाया। वह ग्वालियर घराने की एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायिका बनीं और अपनी मधुर आवाज के कारण उन्हें 'काशी की लता' (Lata of Kashi) के नाम से जाना जाने लगा।
शैक्षणिक उपलब्धियां
शारीरिक और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद, उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी (PhD) की डिग्री हासिल की। बाद में वह BHU के महिला महाविद्यालय में 30 वर्षों तक प्रोफेसर रहीं और 2019 में सेवानिवृत्त हुईं। उन्होंने अपनी आत्मकथा 'सीरत' लिखी है, जिसमें उन्होंने अपने दर्दनाक अनुभवों और संघर्ष को साझा किया है।
मंगला कपूर को मिला पद्मश्री सम्मान
बता दें कि प्रो. मंगला कपूर उन चुनिंदा हस्तियों में हैं, जिनका सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी है। भारतीय शास्त्रीय संगीत उनके लिए केवल कला नहीं, जीवन का पुनर्निर्माण बना। मंगला कपूर को मिला पद्मश्री सम्मान केवल उनकी संगीत साधना का नहीं, बल्कि उस साहस का सम्मान है।




