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घर में ही मिल जाती है शराब तो दुकान की क्या जरूरत...बस ऐसी ही स्थिति को देखकर NDA के ही लोग पूछ रहे हैं शराबबंदी का नाटक क्यों

नई दिल्ली। बिहार में शराबबंदी नीतीश कुमार के लिए ऐतिहासिक निर्णय था। वहीं इसका सियासी तौर पर नीतीश कुमार को लाभ भी हुआ है। लेकिन अब सरकार के गठबंधन में ही शराबबंदी हाटने की मांग हो रही है। दरअसल, 1 अप्रैल 2016 में लागू की गई पूर्ण शराबबंदी को नीतीश कुमार आज भी सामाजिक सुधार और महिलाओं की सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं जबकि एनडीए के कई नेता इसे राज्य के लिए आर्थिक और प्रशासनिक बोझ मानने लगे हैं।
शराबबंदी का सबसे मजबूत आधार बने हुए हैं
हालांकि दिलचस्प यह है कि जहां मुख्यमंत्री शराबबंदी जारी रखने पर अड़े दिखते हैं, वहीं उनके सहयोगी दल समय-समय पर इसे हटाने या कम से कम इसकी समीक्षा की मांग करते रहे हैं। शराबबंदी लागू करते समय नीतीश कुमार ने इसे महिलाओं की मांग बताया था। सरकार का दावा था कि शराब के कारण घरेलू हिंसा, पारिवारिक झगड़े और गरीबी बढ़ रही थी। शराबबंदी के बाद महिला एवं बाल विकास विभाग और पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, शुरुआती दो से तीन वर्षों में घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न से जुड़े मामलों में करीब 12 से 18 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। महिला हेल्पलाइन पर आने वाली शिकायतों में भी कमी आई। यही आंकड़े नीतीश कुमार के लिए शराबबंदी का सबसे मजबूत आधार बने हुए हैं।
शराबबंदी से करोड़ों की राजस्व आय बंद
हालांकि समय के साथ शराबबंदी के नकारात्मक पहलू भी सामने आने लगे। सबसे बड़ा सवाल राज्य के राजस्व को लेकर उठा। शराबबंदी से पहले, यानी 2010 से 2015 के बीच बिहार सरकार को शराब बिक्री से हर साल औसतन चार से पांच हजार करोड़ रुपये का उत्पाद शुल्क मिलता था। वर्ष 2015–16 में यह आमदनी करीब साढ़े चार हजार करोड़ रुपये थी। शराबबंदी के बाद यह आय लगभग खत्म हो गई। इसी दौरान सरकार के खर्च लगातार बढ़ते गए, जिससे राज्य के खजाने पर दबाव बढ़ा।
इसकी समीक्षा तो होनी ही चाहिए
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि हम बहुत समय से कह रहे हैं कि शराब नीति गलत नहीं है, शराबबंदी लागू होनी चाहिए। लेकिन इसके क्रियान्वयन में गड़बड़ियां हैं। इसीलिए हम बार-बार नीतीश कुमार को यह कह रहे हैं और हम उन्हें हमारे कहने पर तीसरी समीक्षा करने के लिए धन्यवाद देते हैं। तीसरी समीक्षा में यह है कि जो लोग मामूली शराब पीते हैं उन्हें नहीं पकड़ना है। लेकिन हमारे यहां क्रियान्वयन अधिकारी उसी को पकड़ते हैं और जो बड़ी-बड़ी तस्करी करते हैं उन्हें पैसे लेकर छोड़ रहे हैं। नीतीश कुमार को कार्रवाई करनी चाहिए। शराबबंदी से बिहार सरकार को काफी आर्थिक नुकसान हो रहा है और नीतीश कुमार को भी इस पर सोचना चाहिए। यहां शराबबंदी तो हो नहीं रही, होम डिलीवरी हो रही है और यहां महंगी शराब बिक रही है। इस पर सोचना चाहिए। इसकी समीक्षा तो होनी ही चाहिए।




