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भारतीय सिनेमा ने 'तीन तलाक' पर बनाई दो फिल्में! हक मूवी नहीं चली, जानिये 80 के दशक में आई निकाह क्‍यों रही ब्लॉकबस्टर...

Anjali Tyagi
9 Jan 2026 2:30 PM IST
भारतीय सिनेमा ने तीन तलाक पर बनाई दो फिल्में! हक मूवी नहीं चली, जानिये 80 के दशक में आई निकाह क्‍यों रही ब्लॉकबस्टर...
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मुंबई। भारतीय सिनेमा ने हमेशा से ही सामाजिक मुद्दों को पर्दे पर उतारकर समाज को आईना दिखाने का काम किया है। हालांकि मुस्लिम समाज में प्रचलित रहे तीन तलाक जैसे संवेदनशील विषय पर फिल्में बनाना हमेशा से विवादास्पद रहा है। 1982 में आई फिल्म 'निकाह' और 2025 में आई 'हक' दोनों ने तीन तलाक पर रोशनी डाली, लेकिन समय ने उनके भाग्य बदल दिए। निकाह ने 1980 के समाज को हिला दिया था, जबकि 'हक' 2025 के संदर्भ में प्रासंगिक होते हुए भी कमदेखी रह गई।

1. संवेदनशील कहानी

बी.आर. चोपड़ा ने 'तलाक' जैसे गंभीर मुद्दे को बहुत ही भावुक और सामाजिक दृष्टिकोण से पेश किया था। फिल्म ने सवाल उठाया था कि क्या औरत सिर्फ एक 'कॉन्ट्रैक्ट' की वस्तु है।

2. संगीत की लोकप्रियता

गुलाम अली की गाई गजल 'चुपके चुपके रात दिन' और रवि द्वारा संगीतबद्ध 'दिल के अरमां आंसुओं में बह गए' आज भी सदाबहार हैं। इस संगीत ने फिल्म को घर-घर पहुंचा दिया था।

3. बेहतरीन अभिनय

सलमा आगा ने अपनी पहली ही फिल्म में अपनी मासूमियत और आवाज से जादू बिखेर दिया था। साथ ही राज बब्बर और दीपक पाराशर के अभिनय को भी काफी सराहा गया।

4. नयापन

उस दौर में 'शरिया' और 'तलाक' के कानूनी पहलुओं पर इतनी गहराई से बनी यह पहली बड़ी फिल्म थी, जिसने दर्शकों को झकझोर दिया था। इसके विपरीत, हाल ही में आई फिल्म 'हक' की विफलता के पीछे कमजोर पटकथा, बड़े सितारों की कमी और सीमित मार्केटिंग को मुख्य कारण माना जाता है। 'निकाह' ने जहां एक भावनात्मक कहानी कही थी, वहीं 'हक' दर्शकों से उस स्तर पर जुड़ाव बनाने में असफल रही।

कैसी थी 'निकाह' की कहानी

बता दें कि 1982 में निर्देशक बी.आर. चोपड़ा द्वारा बनाई गई 'निकाह'की कहानी नीलोफर (सलमा आग़ा), हैदर (राज बब्बर) और वसीम (दीपक पाराशर) के इर्द-गिर्द घूमती है। नीलोफर और हैदर कॉलेज में एक-दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन नीलोफर की शादी एक अमीर व्यवसायी वसीम से हो जाती है। वसीम एक गुस्सैल व्यक्ति है जो एक मामूली झगड़े के दौरान गुस्से में आकर नीलोफर को 'तीन तलाक' दे देता है। बाद में पछताने के बावजूद, वह उसे वापस नहीं ला पाता। नीलोफर की मुलाकात फिर से हैदर से होती है, जो अब एक सफल संपादक है। वे शादी कर लेते हैं। हालांकि, वसीम फिर से नीलोफर को पाने की कोशिश करता है और 'हलाला' की प्रथा का उपयोग करना चाहता है। फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब नीलोफर समाज और दोनों पुरुषों से सवाल करती है कि क्या वह कोई वस्तु है जिसे एक आदमी अपनी मर्जी से छोड़ सकता है और दूसरा अपनी मर्जी से अपना सकता है

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