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भारतीय महिलाएं और टीवी सीरियल्स: मनोरंजन या एक मनोवैज्ञानिक 'लत'?

भारत के मध्यमवर्गीय घरों में शाम ढलते ही टीवी स्क्रीन्स पर 'सास-बहू' और पारिवारिक ड्रामे का शोर शुरू हो जाता है। यह महज मनोरंजन नहीं, बल्कि करोड़ों महिलाओं की जीवनशैली का एक अटूट हिस्सा बन चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस 'लत' के पीछे कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं।
भावनात्मक जुड़ाव
ये धारावाहिक अक्सर घरेलू संघर्षों और रिश्तों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। महिलाएं इन किरदारों में खुद को या अपने परिवेश को देखती हैं, जिससे एक गहरा 'पैरा-सोशल' रिश्ता बन जाता है।
दैनिक तनाव से मुक्ति (Escapism)
घर के कामों और जिम्मेदारियों के बीच, ये सीरियल्स महिलाओं के लिए एक 'मेंटल ब्रेक' की तरह काम करते हैं। वे काल्पनिक दुनिया में खोकर अपनी बोरियत दूर करती हैं।
सामाजिक चर्चा का विषय
मोहल्लों और किटी पार्टियों में सीरियल्स के ट्विस्ट पर चर्चा करना सामाजिक मेलजोल का जरिया बन गया है। पीछे छूट जाने का डर (FOMO) उन्हें हर एपिसोड देखने पर मजबूर करता है।
अधूरी इच्छाओं की पूर्ति
सीरियल्स में दिखाई जाने वाली भव्यता, गहने और नाटकीय न्याय अक्सर दर्शकों को एक 'फील-गुड' अनुभव देते हैं।
क्या यह चिंता का विषय है?
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब यह शौक सामाजिक मेलजोल कम कर दे या नींद और स्वास्थ्य को प्रभावित करने लगे, तो यह लत की श्रेणी में आ जाता है। सीरियल्स में दिखाए जाने वाले नकारात्मक चित्रण कभी-कभी वास्तविक जीवन के रिश्तों में भी कड़वाहट पैदा कर देते हैं।




