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महाराणा प्रताप की पुण्‍यतिथि! बेजोड़ शौर्य, अपराजित साहस, जानें मेवाड़ के प्रताप ने कैसे दी अकबर के शासन को चुनौती...

Anjali Tyagi
19 Jan 2026 11:03 AM IST
महाराणा प्रताप की पुण्‍यतिथि! बेजोड़ शौर्य, अपराजित साहस, जानें मेवाड़ के प्रताप ने कैसे दी अकबर के शासन को चुनौती...
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नई दिल्ली। महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि 19 जनवरी को मनाई जाती है। यह दिन भारतीय इतिहास के एक महान योद्धा और राणा की वीरता को याद करने का दिन है। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुम्भलगढ़ में हुआ था, और वे मेवाड़ के राजा थे। उनकी वीरता, शौर्य को हर कोई आज भी याद रखता है।

अपराजित साहस

महाराणा प्रताप ने कभी भी मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन जंगलों में बिताया और घास की रोटियां खाईं, लेकिन कभी सिर नहीं झुकाया।

हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध

1576 में हुआ हल्दीघाटी का युद्ध इतिहास के सबसे भीषण युद्धों में से एक माना जाता है। इसमें प्रताप की छोटी सी सेना ने अकबर की विशाल सेना का डटकर मुकाबला किया था। हल्दीघाटी का युद्ध भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। यह युद्ध 18 जून, 1576 को लड़ा गया था। यह युद्ध मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर की सेना के बीच हुआ था। मुगल सेना का नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह प्रथम ने किया था। यह युद्ध अनिर्णायक माना जाता है। मुगल सेना न तो महाराणा प्रताप को बंदी बना सकी और न ही मेवाड़ को पूरी तरह अपने अधीन कर सकी। महाराणा प्रताप ने पहाड़ियों में सुरक्षित रहकर अपना संघर्ष जारी रखा। यह युद्ध महाराणा प्रताप के अदम्य साहस, वीरता और मातृभूमि के प्रति उनके त्याग के लिए जाना जाता है। उनके प्रिय घोड़े चेतक की बहादुरी की गाथाएं भी इसी युद्ध से जुड़ी हैं।

चेतक की वफादारी

उनके प्रिय घोड़े 'चेतक' की वीरता भी प्रसिद्ध है। हल्दीघाटी के युद्ध में घायल होने के बावजूद, चेतक ने प्रताप को सुरक्षित निकालने के लिए 26 फीट लंबे नाले को एक छलांग में पार कर लिया था।

शारीरिक शक्ति

कहा जाता है कि महाराणा प्रताप लगभग 7 फीट 5 इंच लंबे थे। वे युद्ध के दौरान लगभग 81 किलो का भाला और 72 किलो का कवच पहनते थे, जो उनकी असाधारण शक्ति का प्रमाण है।

छापामार युद्ध नीति

प्रताप ने सीमित संसाधनों के बावजूद मुगलों को चुनौती देने के लिए 'छापामार युद्ध' (Guerilla Warfare) की तकनीक का प्रभावी ढंग से उपयोग किया, जिससे मुगल सेना हमेशा भयभीत रहती थी।

भील समुदाय का साथ

उन्होंने समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने का उदाहरण पेश किया। जंगलों में रहने वाले भील आदिवासियों ने उनकी सेना में कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध लड़ा और उन्हें 'कीका' कहकर पुकारते थे।

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