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नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री को नमन! जानें कैसे करें माता की पूजा और कथा

नई दिल्ली। नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप, मां शैलपुत्री की पूजा और व्रत किया जाता है। ये शक्ति, स्थिरता और नई शुरुआत का प्रतीक हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें 'शैलपुत्री' कहा जाता है। वे वृषभ (बैल) पर सवार हैं, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल धारण करती हैं, जो स्थिरता, शक्ति और पवित्रता का प्रतीक है। इन्हें पार्वती और हेमवती के नाम से भी जाना जाता है।
पूजा विधि
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थान की सफाई कर व्रत का संकल्प लें।
- नवरात्रि के पहले दिन शुभ मुहूर्त में घटस्थापना (कलश स्थापना) की जाती है।
- मां शैलपुत्री की तस्वीर या मूर्ति को चौकी पर स्थापित करें। उन्हें रोली, अक्षत, और सिंदूर लगाएं।
- मां को सफेद रंग के फूल (जैसे चमेली) अत्यंत प्रिय हैं।
- पूजा के अंत में मां शैलपुत्री की आरती उतारें और दुर्गा चालीसा या सप्तशती का पाठ करें।
भोग
मां शैलपुत्री को गाय के घी का भोग लगाना सबसे शुभ माना जाता है। इससे आरोग्य की प्राप्ति होती है। उन्हें सफेद वस्तुएं प्रिय हैं, इसलिए सफेद मिठाई का भोग भी लगाया जा सकता है।
मां शैलपुत्री का मंत्र
पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप करना फलदायी होता है:
"या देवी सर्वभूतेषु मां शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।"
व्रत कथा
अपने पूर्व जन्म में माँ शैलपुत्री 'सती' थीं और राजा दक्ष की पुत्री थीं। जब उनके पिता दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया, तो सती ने योगाग्नि में खुद को भस्म कर लिया था। अगले जन्म में उन्होंने हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री कहलाईं।




