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धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास की जांच का अधिकार कोर्ट को, केवल संसद ही अंतिम फैसला नहीं कर सकती...सबरीमाला मामले में जज ने कहा

Shilpi Narayan
8 April 2026 2:21 PM IST
धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास की जांच का अधिकार कोर्ट को, केवल संसद ही अंतिम फैसला नहीं कर सकती...सबरीमाला मामले में जज ने कहा
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नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बयान दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि वह धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास है या नहीं, इसकी जांच करने का अधिकार रखता है और इस मामले में केवल संसद ही अंतिम फैसला नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच, जिसकी अगुवाई न्यायमूर्ति सूर्यकांत कर रहे थे, उन्होंने कहा कि अदालत यह तय कर सकती है कि कोई धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं।

धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा

इसके बाद उस पर क्या कदम उठाना है, यह संसद का काम हो सकता है, लेकिन अदालत के अधिकार को नकारा नहीं जा सकता। यह टिप्पणी उस समय आई जब सबरीमला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को लेकर बहस चल रही थी। यह मामला महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा है। कोर्ट ने अपने तर्क को समझाने के लिए सती प्रथा, जादू-टोना और नरभक्षण जैसे उदाहरण भी दिए और कहा कि अगर कोई प्रथा समाज को झकझोरती है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।

सरकार और कोर्ट के बीच बहस

सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय नहीं कर सकती कि क्या अंधविश्वास है, क्योंकि अदालत को धार्मिक ज्ञान नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में अलग-अलग राज्यों और समाजों में अलग-अलग मान्यताएं हैं, इसलिए जो एक जगह धार्मिक है, वह दूसरी जगह अंधविश्वास माना जा सकता है। इस पर जजों ने सवाल उठाए और कहा कि अगर कोई प्रथा जैसे जादू-टोना को धर्म का हिस्सा बताया जाए, तो क्या उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा?

अदालत के अधिकार पर जोर

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अगर किसी मामले में कानून नहीं है, तो क्या अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती? उन्होंने कहा कि अदालत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर ऐसे मामलों में दखल दे सकती है। इस पर तुषार मेहता ने कहा कि अदालत हस्तक्षेप कर सकती है, लेकिन केवल अंधविश्वास के आधार पर नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के आधार पर। जस्टिस एमएम सुंदरेश ने भी कहा कि सरकार यह नहीं कह सकती कि अदालत के पास इस मामले में कोई अधिकार नहीं है। अगर कोई प्रथा सती जैसी गलत हो, तो अदालत जरूर हस्तक्षेप कर सकती है।

'जरूरी धार्मिक प्रथा' पर चर्चा

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि अदालत को यह भी देखना होगा कि कोई प्रथा उस धर्म के लिए ‘जरूरी’ है या नहीं। यह जांच उस धर्म की सोच और परंपरा के आधार पर ही होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी दूसरे धर्म के नजरिए से यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई प्रथा जरूरी है या नहीं, लेकिन यह सब सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के दायरे में ही होना चाहिए। वहीं मुख्य न्यायाधीश ने भी माना कि अदालत धार्मिक विशेषज्ञ नहीं है, लेकिन अगर कोई प्रथा बहुत गलत लगे, जैसे नरबलि या जादू-टोना, तो उस पर ज्यादा जांच की जरूरत नहीं होती और अदालत सीधे दखल दे सकती है।

सरकार का पक्ष क्या है?

सरकार का कहना है कि सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक भेदभाव नहीं है, बल्कि यह भगवान अयप्पा की धार्मिक मान्यता से जुड़ी है, जिन्हें 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' माना जाता है। सरकार ने यह भी कहा कि हर धार्मिक परंपरा को केवल व्यक्तिगत अधिकार या समानता के नजरिए से नहीं देखा जा सकता, बल्कि हर धर्म की अपनी मान्यताओं का सम्मान होना चाहिए।

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