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गंगा-जमुनी तहजीब का अनूठा उदाहरण है हजरत निजामुद्दीन दरगाह! बसंत पंचमी के दिन हिन्दू-मुस्लिम मिलकर मनाते हैं जश्न...

नई दिल्ली। दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर बसंत पंचमी के दिन एक विशेष और ऐतिहासिक उत्सव मनाया जाता है। यह परंपरा लगभग 800 वर्षों से चली आ रही है और हिंदू-मुस्लिम एकता (गंगा-जमुनी तहजीब) का एक अनूठा उदाहरण है। हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर बसंत पंचमी में जहां हिन्दू-मुस्लिम मिलकर पीले वस्त्र पहनकर और पीले फूल चढ़ाकर, सूफी संगीत (कव्वाली) के साथ सद्भाव और वसंत के आगमन का जश्न मनाते हैं।
अमीर खुसरो के समय से चली आ रही एक अनूठी परंपरा
बता दें कि इस दिन दरगाह पूरी तरह पीली चादरों और गेंदे के फूलों से सज जाती है, और यह अमीर खुसरो के समय से चली आ रही एक अनूठी परंपरा है। यह त्योहार धार्मिक सद्भाव और सामाजिक एकता का संदेश देता है, जहां लोग एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होकर भारतीय संस्कृति की खूबसूरती को दर्शाते हैं।
क्यों है यह खास?
- यह परंपरा 13वीं-14वीं सदी से है, जब अमीर खुसरो ने हजरत निजामुद्दीन औलिया को खुश करने के लिए पीले फूल और साड़ी पहनकर 'सकल बन फूल रही सरसों' गाते हुए नृत्य किया था।
- यह हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच प्रेम, एकता और syncretic संस्कृति का प्रतीक है, जहाँ सभी मिलकर वसंत का स्वागत करते हैं।
- दरगाह पर पीले रंग की चादरें, गेंदे के फूल और शाम को होने वाली कव्वालियाँ एक अद्भुत और मनमोहक माहौल बनाती हैं।




