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महिषी का उग्रतारा मंदिर: तंत्र साधना और शास्त्रार्थ की ऐतिहासिक भूमि

सहरसा,बिहार। कोसी प्रमंडल के सहरसा जिले से लगभग 17 किलोमीटर दूर स्थित महिषी गांव अपनी धार्मिक और बौद्धिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है। यहां का उग्रतारा मंदिर न केवल एक सिद्ध शक्तिपीठ है, बल्कि यह हिंदू और बौद्ध तंत्र पद्धतियों के संगम का प्रतीक भी माना जाता है।
प्रमुख आकर्षण और धार्मिक महत्व
शक्तिपीठ की मान्यता: पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंग काटे थे, तब यहां उनका बायां नेत्र गिरा था। इसी कारण इसे 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
त्रिमूर्ति स्वरूप: मंदिर के गर्भगृह में भगवती तारा की लगभग 1.6 मीटर ऊंची काले पत्थर की प्राचीन प्रतिमा है। इनके दोनों ओर 'एकजटा' और 'नील सरस्वती' की मूर्तियां स्थापित हैं।
तंत्र साधना का केंद्र: यह मंदिर दस महाविद्याओं में से दूसरी विद्या, 'मां तारा' को समर्पित है। शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां देश-विदेश से तांत्रिक और साधक विशेष 'सिद्धि' प्राप्त करने आते हैं।
ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत
महिषी गांव केवल मंदिरों के लिए ही नहीं, बल्कि ज्ञान की परंपरा के लिए भी जाना जाता है:
महाशास्त्रार्थ: यह वही भूमि है जहां 8वीं शताब्दी में महान दार्शनिक मंडन मिश्र और आदि शंकराचार्य के बीच ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ था। इस संवाद की न्यायकर्ता मंडन मिश्र की पत्नी विदुषी भारती थीं।
ऋषि वशिष्ठ की तपस्थली: माना जाता है कि महर्षि वशिष्ठ ने इसी स्थान पर घोर तपस्या कर मां तारा को प्रसन्न किया था, जिसके कारण इन्हें 'वशिष्ठ आराधिता उग्रतारा' भी कहा जाता है।
पर्यटन और पहुंच
वर्तमान में बिहार पर्यटन विभाग इस स्थल को एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित कर रहा है।
कैसे पहुंचें: सहरसा जंक्शन यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन है। सड़क मार्ग से ऑटो या निजी वाहनों द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।




