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UP Diwas 2026: कभी ब्रह्मर्षि, कभी आर्यावर्त... कैसा बना ‘उत्तर प्रदेश’, वैदिक काल से मुगल दौर तक ऐसा था राज्य का इतिहास!

Anjali Tyagi
24 Jan 2026 12:00 PM IST
UP Diwas 2026: कभी ब्रह्मर्षि, कभी आर्यावर्त... कैसा बना ‘उत्तर प्रदेश’, वैदिक काल से मुगल दौर तक ऐसा था राज्य का इतिहास!
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश दिवस (UP Diwas) हर साल 24 जनवरी को राज्य के स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है। अंग्रेजों ने उत्तर प्रदेश का नाम 4 बार बदला। राजधानी पहले इलाहाबाद, आगरा और फिर लखनऊ हुई। बदलाव यहीं नहीं रुका। आजादी के बाद एक बार फिर इसका नाम बदलने की कोशिश शुरू हुई और तमाम नामों के बीच "आर्यावर्त" नाम पर सहमति बनी। हालांकि, इस पर मुहर नहीं लगाई गई और उत्तर प्रदेश नाम इतिहास में दर्ज हुआ।

नाम परिवर्तन की याद में

24 जनवरी 1950 को ही भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल ने 'यूनाइटेड प्रोविंस' (United Provinces) का नाम बदलकर 'उत्तर प्रदेश' करने के आदेश को मंजूरी दी थी।

राज्य की पहचान

यह दिन उत्तर प्रदेश की समृद्ध संस्कृति, इतिहास और विरासत का जश्न मनाने और लोगों में अपनी प्रादेशिक पहचान के प्रति गर्व महसूस कराने के लिए मनाया जाता है।

सरकारी पहल

हालांकि राज्य की स्थापना 1950 में हुई थी, लेकिन उत्तर प्रदेश दिवस को आधिकारिक रूप से मनाने की शुरुआत 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा की गई थी।

‘उत्तर प्रदेश’ नाम क्यों चुना गया?

उत्तर प्रदेश नाम रखने की सबसे बड़ी वजह इसकी भौगोलिक स्थिति थी. यह राज्य भारत के उत्तरी हिस्से में स्थित है, इसलिए ‘उत्तर’ शब्द जोड़ा गया। ‘प्रदेश’ का मतलब क्षेत्र या राज्य होता है, यानी उत्तर दिशा में स्थित राज्य होता है। यह नाम सरल था, आसानी से समझ में आने वाला था और पूरे देश के लिए एक साफ पहचान बनाता था।

पुराने नाम क्यों नहीं अपनाए गए?

आर्यावर्त, मध्य देश या ब्रह्मर्षि देश जैसे नाम ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थे, लेकिन इन्हें आधुनिक प्रशासन के लिए उपयुक्त नहीं माना गया। आजाद भारत एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहता था, जहां नाम सरल, गैर-विवादित और भौगोलिक रूप से स्पष्ट हों। ‘उत्तर प्रदेश’ इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता था।

वैदिक काल से मुगल दौर तक ऐसा था राज्य का इतिहास

आज के उत्तर प्रदेश को प्राचीन काल में अलग-अलग नामों से जाना जाता था। वैदिक युग में यह इलाका ब्रह्मर्षि देश और मध्य देश कहलाता था। यही वह भूमि थी जहां से आर्य संस्कृति, धर्म और दर्शन का प्रसार हुआ। बाद के दौर में इसे आर्यावर्त भी कहा गया। मुगल काल में यह क्षेत्र किसी एक नाम से नहीं जाना गया, बल्कि प्रशासनिक सुविधा के लिए इसे कई हिस्सों में बांट दिया गया।

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