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चद्रंगहण के समय क्यों खूनी लाल हो जाता है चांद? क्या थी ग्रहण की मान्यताएं!

Anjali Tyagi
3 March 2026 8:00 PM IST
चद्रंगहण के समय क्यों खूनी लाल हो जाता है चांद? क्या थी ग्रहण की मान्यताएं!
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नई दिल्ली। आज भारत में साल का पहला चद्रंगहण पड़ा। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर चांद का रंग खूनी लाला का क्यों हो जाता है। दरअसल चांद का खूनी लाल (Blood Moon) होना विज्ञान के लिए एक वायुमंडलीय घटना है, लेकिन प्राचीन सभ्यताओं ने इसके लिए 'जगुआर' और 'राक्षसों' को जिम्मेदार ठहराया था।

विभिन्न मान्यताओं का कारण

1. इंका सभ्यता: खूनी जगुआर का हमला

प्राचीन इंका (Inca) लोगों का मानना था कि एक विशाल जगुआर चांद पर हमला करता है और उसे खाने की कोशिश करता है। उनके अनुसार, चांद का लाल रंग जगुआर के पंजों से निकले खून के कारण होता था। उन्हें डर था कि चांद को खाने के बाद जगुआर धरती पर गिरकर इंसानों को भी खा जाएगा। वे शोर मचाते थे, अपने कुत्तों को पीटते थे ताकि उनके भौंकने और रोने की आवाज से जगुआर डरकर भाग जाए।

2. भारतीय पौराणिक कथा: राहु-केतु का प्रतिशोध

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, चंद्र ग्रहण के लिए राहु और केतु नामक राक्षस जिम्मेदार हैं। समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान विष्णु (मोहिनी रूप) देवताओं को अमृत पिला रहे थे, तब 'स्वर्भानु' (राहु) नाम का असुर वेश बदलकर देवताओं के बीच बैठ गया। चंद्रदेव और सूर्यदेव ने उसे पहचान लिया और विष्णु जी को बताया, जिन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया। क्योंकि उसने अमृत पी लिया था, वह अमर हो गया। उसका सिर 'राहु' और धड़ 'केतु' कहलाया। प्रतिशोध लेने के लिए राहु समय-समय पर चंद्रमा को निगलने का प्रयास करता है, जिसे हम ग्रहण कहते हैं।

3. अन्य संस्कृतियां और मान्यताएं

मेसोपोटामिया के अनुसार माना जाता था कि चाँद पर सात राक्षसों ने हमला कर दिया है।

चीन: प्राचीन चीनी मानते थे कि एक स्वर्गीय ड्रैगन चंद्रमा को निगल रहा है।

हुपा जनजाति (कैलिफ़ोर्निया): वे मानते थे कि चाँद की पत्नियों (20 पत्नियाँ) के पालतू पहाड़ी शेर और सांप उसे काटते हैं जब वह उन्हें खाना नहीं देता, जिससे वह लहूलुहान होकर लाल हो जाता है।

वैज्ञानिक कारण (वास्तविकता)

विज्ञान के अनुसार, पूर्ण चंद्र ग्रहण के समय पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है। पृथ्वी का वायुमंडल सूर्य की रोशनी को फ़िल्टर करता है, जिसमें नीली रोशनी बिखर जाती है और केवल लाल तरंगदैर्ध्य (Red Wavelength) ही चाँद तक पहुँचती है। इसे रेले स्कैटरिंग कहते हैं।

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