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समसामयिक लेख :नाराजगी के बीच डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति

Shilpi Narayan
18 March 2026 11:30 PM IST
समसामयिक लेख :नाराजगी के बीच डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति
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डा चेतन आनंद

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का कार्यकाल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसे दौर के रूप में देखा जाता है जिसने पारंपरिक वैश्विक संबंधों को नई दिशा दी। उनकी नीतियां, निर्णय लेने की शैली और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण ने दुनिया के कई देशों को प्रभावित किया। कुछ देशों ने उनके कदमों का समर्थन किया, तो अनेक देशों में असंतोष और चिंता भी दिखाई दी। इस कारण वैश्विक स्तर पर यह चर्चा तेज हुई कि ट्रम्प के दौर में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा और टकराव की राजनीति को बढ़ावा मिला।

“अमेरिका फर्स्ट” की नीति और उसका प्रभाव

ट्रम्प प्रशासन की सबसे प्रमुख नीति अमेरिका फर्स्ट वाली रही, जिसका उद्देश्य अमेरिकी उद्योग, रोजगार और सुरक्षा को प्राथमिकता देना था। यह नीति घरेलू स्तर पर लोकप्रिय रही, लेकिन कई देशों को लगा कि इससे वैश्विक सहयोग की भावना कमजोर होगी। यूरोप और एशिया के कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और बहुपक्षीय समझौतों से दूरी बनाने की दिशा में कदम माना। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अमेरिका की पारंपरिक वैश्विक नेतृत्व भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगा।

चीन के साथ व्यापार युद्ध

ट्रम्प के कार्यकाल में सबसे बड़ा आर्थिक विवाद चीन के साथ व्यापार युद्ध को लेकर हुआ। अमेरिका ने चीन से आयातित वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाए और तकनीकी कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगाए। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क बढ़ा दिए। इस टकराव का असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्ख्विक आपूर्ति श्रृंखला और बाजारों में अस्थिरता फैल गई। कई विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर भी इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संघर्ष ने वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस को जन्म दिया।

यूरोप के साथ मतभेद

यूरोप के प्रमुख देशों जैसे जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ भी ट्रम्प प्रशासन के संबंधों में तनाव देखा गया। विशेष रूप से रक्षा खर्च और सैन्य सहयोग को लेकर दिए गए बयानों ने असहजता पैदा की। ट्रम्प ने कई बार कहा कि यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा पर अधिक खर्च करना चाहिए और अमेरिका पर निर्भरता कम करनी चाहिए। इससे पारंपरिक सैन्य गठबंधन नाटो के भविष्य को लेकर भी चर्चा तेज हुई। इसके अलावा पर्यावरण नीति और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भी मतभेद सामने आए। यूरोपीय देशों ने वैश्विक पर्यावरणीय प्रयासों में अमेरिका की भूमिका को कमजोर पड़ता हुआ महसूस किया।

कनाडा और मैक्सिको के साथ आर्थिक विवाद

उत्तर अमेरिका के पड़ोसी देशों कनाडा और मैक्सिको के साथ भी ट्रम्प प्रशासन के संबंध पूरी तरह सहज नहीं रहे। स्टील और एल्युमिनियम पर लगाए गए शुल्क से कनाडा में नाराज़गी देखी गई। मैक्सिको के साथ सीमा दीवार और प्रवासन नीति को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। हालाँकि बाद में नए व्यापार समझौतों के जरिए संबंधों को संतुलित करने की कोशिश की गई।

ईरान और मध्य-पूर्व की राजनीति

ट्रम्प प्रशासन का एक महत्वपूर्ण निर्णय ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका का बाहर निकलना था। इसके बाद आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य तनाव बढ़ने से दोनों देशों के संबंध बेहद खराब हो गए। मध्य-पूर्व की राजनीति में लिए गए कुछ फैसलों ने फ़िलिस्तीन सहित कई देशों में असंतोष पैदा किया। हालांकि दूसरी ओर, कुछ अरब देशों के साथ नए कूटनीतिक समझौते भी हुए, जिन्हें क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में सकारात्मक कदम माना गया।

एशियाई सहयोगियों के साथ संतुलन

जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की जैसे सहयोगी देशों के साथ भी समय-समय पर व्यापार और रक्षा खर्च के मुद्दों पर मतभेद सामने आए। ट्रम्प का मानना था कि अमेरिका लंबे समय से अपने सहयोगियों की सुरक्षा पर अत्यधिक खर्च कर रहा है। रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस दृष्टिकोण ने सहयोगी देशों को अपनी रक्षा नीति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया, लेकिन साथ ही असुरक्षा की भावना भी पैदा की।

कूटनीतिक शैली और वैश्विक प्रतिक्रिया

ट्रम्प की व्यक्तिगत राजनीतिक शैली भी वैश्विक चर्चा का विषय रही। वे अक्सर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर सीधे और तीखे बयान देते थे। इससे पारंपरिक कूटनीतिक प्रक्रियाओं की जगह सार्वजनिक संवाद और विवाद बढ़ते दिखाई दिए। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अनिश्चितता का माहौल बना, क्योंकि कई बार अचानक दिए गए बयानों से नीतिगत दिशा स्पष्ट नहीं रहती थी।

समर्थन और सकारात्मक पहलू

हालाँकि यह भी सच है कि ट्रम्प की नीतियों का पूरी दुनिया ने विरोध नहीं किया। कुछ देशों ने आतंकवाद के खिलाफ कठोर रुख और चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती देने की रणनीति का समर्थन किया। अमेरिका के भीतर भी उद्योगों को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन के प्रयासों को सराहा गया। कई लोगों ने इसे वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभावों के खिलाफ एक आवश्यक कदम माना।

भारत के दृष्टिकोण से प्रभाव

भारत के लिए ट्रम्प का दौर मिश्रित अनुभव वाला रहा। रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी मजबूत हुई, लेकिन व्यापार और वीज़ा नीति को लेकर चुनौतियाँ भी सामने आईं। विदेश नीति के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने संतुलित कूटनीति अपनाकर अमेरिका के साथ सहयोग बनाए रखने के साथ-साथ अपने राष्ट्रीय हितों को भी प्राथमिकता दी।

शक्ति संतुलन की राजनीति और गहराएगी

डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति ने वैश्विक राजनीति में एक नए युग की शुरुआत की, जिसमें राष्ट्रवाद, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक पुनर्संतुलन प्रमुख विषय बन गए। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि पूरी दुनिया उनसे नाराज थी, लेकिन यह निश्चित है कि उनकी नीतियों ने पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों को चुनौती दी और नए समीकरणों को जन्म दिया। आज भी जब अमेरिकी राजनीति में उनकी संभावित वापसी की चर्चा होती है, तब दुनिया के कई देश उनके रुख और नीतिगत प्राथमिकताओं पर ध्यानपूर्वक नजर रखते हैं। आने वाले समय में यह तय करेगा कि वैश्विक व्यवस्था सहयोग और संवाद की दिशा में आगे बढ़ेगी या प्रतिस्पर्धा और शक्ति संतुलन की राजनीति और गहराएगी।

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