31 साल के जवान बेटे की इच्छामृत्यु की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा, जानें यह हृदयविदारक मामला
गाजियाबाद। दुनिया के कोई भी माता-पिता अपने बच्चे को दर्द में नहीं देख पाते हैं। मां-बाप हर हालात में अपने बच्चों की सलामती के लिए हर संभव कदम उठाते हैं। लेकिन कितना मुश्किल होगा कि कोई मां-बाप अपने ही बच्चे के लिए मौत मांगे। जी हां ये कहानी गाजियाबाद के हरीश राणा की है। गाजियाबाद में रहने वाला राणा दंपति ने अपने 31 साल के जवान बेटे को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनिशिया) देने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। हरीश के माता-पिता की ओर से दायर याचिका पर आज फैसला आना है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसला सुना दिया है।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस हृदयविदारक मामले की पूरी सुनवाई के बाद निर्णय रिजर्व किया है, जो देश में 'पैसिव यूथेनेसिया के नियमों को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
12 साल से कोमा में
हरीश राणा साल 2013 में अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिसके बाद उन्हें सिर में गंभीर चोटें आईं। तब से वे परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) यानी कोमा में हैं।
माता-पिता की गुहार
हरीश के बुजुर्ग माता-पिता अब 80 वर्ष के करीब हैं। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपने बेटे के लिए 'पैसिव यूथेनेशिया' (Passive Euthanasia) की अनुमति मांगी थी। उनका तर्क है कि वे अब शारीरिक और आर्थिक रूप से हरीश की देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं और वे नहीं चाहते कि उनके जाने के बाद उनका बेटा लावारिस हालत में तड़पे।