जब गणेश जी के पेट में होने लगी थी बहुत जलन...जानें क्यों अर्पित की जाती है दूर्वा, पढ़ें पौराणिक कथा

By :  Aryan
Update: 2025-08-30 02:30 GMT

 सभी देवताओं के पूजा करने का अलग विधान होता है। जैसे भगवान शिव को बेलपत्र, विष्णु को तुलसी और देवी दुर्गा को लाल पुष्प अर्पित किए जाते हैं, उसी तरह से गणेश जी को दूर्वा अर्पित किया जाता है। मुख्य रूप से 21 दूर्वा-दल अर्पित करने का विधान है। इस परंपरा के पीछे केवल आस्था नहीं है इसके पीछे गहरी पौराणिक, आध्यात्मिक, ज्योतिषीय एवं कुछ वैज्ञानिक रहस्य भी छिपे हुए हैं।

दूर्वा का पौराणिक महत्व

पौराणिक कथा के मुताबिक, एक समय अनलासुर नामक असुर ने देवताओं और ऋषियों का जीना मुश्किल कर दिया था। उसके अग्नि जैसे विषैले तेज से सब जलने लगे। तब देवताओं ने भगवान गणपति से प्रार्थना की, फिर उन्होंने अनलासुर का वध करने के लिए उसे निगल लिया। लेकिन अनलासुर के विष से गणेश जी का पेट में बहुत जलन होने लगी थी। देवताओं और ऋषियों ने उनके कष्ट को शांत करने के लिए अनेक उपाय किए, किंतु कोई सफल नहीं हुआ। अंत में गणेश जी को दूर्वा अर्पित की गई, तब उनका पेट ठंडा हो गया और वे शांत हो गए। तभी से गणेश जी की पूजा में दूर्वा का उपयोग किया जाने लगा।

दूर्वा का प्रतीकात्मक महत्व

दूर्वा सदैव हरी-भरी रहती है, चाहे कितनी भी इसे काटा जाए, यह पुनःजीवित हो जाती है। इससे हमें सीख मिलती है जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव और कठिनाइयों के बावजूद फिर से उठा जाता है।

दूर्वा का वैज्ञानिक महत्व

दूर्वा में प्राकृतिक ग्लूकोज और औषधीय तत्व पाए जाते हैं। यह शरीर की अत्यधिक गर्मी, जलन और विष प्रभाव को शांत करती है। आयुर्वेद में दूर्वा को शीतल, रक्तस्राव रोकने वाली और रोग नाशक बताया गया है।

पूजा में दूर्वा अर्पित करने की विधि

गणेश जी को दूर्वा चढ़ाने की विधि भी निश्चित है। गणेश जी की सूंड, मस्तक और कानों पर दूर्वा विशेष रूप से चढ़ाई जाती है। दूर्वा अर्पित करने के बाद लड्डू या मोदक का भोग लगाया जाता है।

21 दूर्वा अर्पित करने से भक्त को अनेक प्रकार के लाभ मिलते हैं। जीवन के सभी विघ्नों का नाश होता है। धन-धान्य, वैभव और समृद्धि की प्राप्ति होती है। संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है।


Tags:    

Similar News