फुलेरा दूज पर क्यों खेली जाती है फूलों की होली? क्या है इस परंपरा का महत्व, जानिए प्राकृतिक जुड़ाव
नई दिल्ली। फुलेरा दूज का हिंदू धर्म में एक बहुत ही प्रेमपूर्ण स्थान है। फुलेरा दूज को राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का प्रतीक माना जाता है। इस दिन फूलों की होली खेलने की परंपरा के पीछे एक सुंदर पौराणिक कथा और गहरा आध्यात्मिक महत्व है।
फुलेरा दूज पर फूलों की होली क्यों खेली जाती है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण लंबे समय तक व्यस्त रहने के कारण राधा रानी से मिलने नहीं जा सके। कृष्ण के वियोग में राधा रानी अत्यंत दुखी हो गईं, जिसका प्रभाव प्रकृति पर पड़ा और ब्रज के वन व फूल सूखने लगे। जब श्रीकृष्ण को इस बात का पता चला, तो वे तुरंत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को राधा जी से मिलने पहुंचे। राधा रानी को उदास देखकर कृष्ण ने एक फूल तोड़कर उन पर फेंका, जिससे उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। इसके बाद गोपियों ने भी एक-दूसरे पर फूल बरसाने शुरू कर दिए। तभी से इस दिन को 'फुलेरा' (फूलों से संबंधित) कहा जाने लगा और राधा-कृष्ण के मिलन की खुशी में फूलों की होली खेलने की परंपरा शुरू हुई।
इस अनोखी परंपरा का महत्व
होली की शुरुआत: फुलेरा दूज से ही ब्रज क्षेत्र (मथुरा और वृंदावन) में होली के उत्सव की विधिवत शुरुआत मानी जाती है।
अबूझ मुहूर्त: धार्मिक दृष्टि से यह दिन दोषमुक्त होता है। इसे एक 'अबूझ मुहूर्त' माना जाता है, जिसमें शादी, सगाई या गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्यों के लिए पंडित से मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता नहीं होती।
रिश्तों में मधुरता: मान्यता है कि इस दिन राधा-कृष्ण की पूजा करने और उन्हें गुलाल व फूल अर्पित करने से वैवाहिक जीवन और प्रेम संबंधों में मिठास आती है।
प्राकृतिक जुड़ाव: फूलों की होली प्रकृति के साथ जुड़ने और वसंत ऋतु के आगमन का जश्न मनाने का माध्यम है। इस दिन विशेष रूप से पोहा का भोग लगाया जाता है और भक्त भजन-कीर्तन में लीन रहते हैं।