AI ऐप ‘स्वासा’ का कमाल! अब घर बैठे होगी खांसी की जांच, जानें मरीजों के हेल्थ को कैसे स्कोर करता है...
दिल्ली एम्स के डॉक्टरों ने कर्नाटक में विकसित किए गए Shwasa नाम के एआई से जुड़े मोबाइल ऐप का अध्ययन किया है।
नई दिल्ली। मेडिकल के क्षेत्र में भी एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। दिल्ली एम्स के डॉक्टरों ने कर्नाटक में विकसित किए गए ‘श्वासा’ (Shwasa) नाम के एक एआई से जुड़े मोबाइल ऐप का अध्ययन किया है। यह एआई ऐप स्मार्टफोन के माध्यम से किसी भी मरीज की खांसी की आवाज सुनकर उसका विश्लेषण करता है और इसके आधार पर जान लेता है कि मरीज को फेफड़ो या श्वसन तंत्र की कौन सी बीमारी है।
गंभीर बीमारी की भी हो जाएगी पहचान
एम्स के विशेषज्ञों ने दावा किया है इस एआई तकनीक के जरिए क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) जैसी गंभीर बीमारी की भी पहचान की जा सकती है। दिल्ली एम्स के सेंटर फॉर कम्युनिटी मेडिसिन के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. हर्षल रमेश साल्वे ने बताया कि कर्नाटक में विकसित इस एआई आधारित ऐप पर उत्तर भारत में किसी भी संस्थान ने अध्ययन नहीं किया था। दिल्ली एम्स के डॉक्टरों ने इस पर अध्ययन किया।
इस ऐप के फायदे
दिल्ली एम्स के सेंटर फॉर कम्युनिटी मेडिसिन के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. हर्षल रमेश साल्वे ने बताया कि एक बार स्मार्टफोन पर रिकॉर्ड होने के बाद यह एआई ऐप सांस की नली में रुकावट या फेफड़ों की समस्याओं के संकेतों की पहचान करने के लिए सूक्ष्म आवाजों के पैटर्न का विश्लेषण करता है और महज पांच मिनट से भी कम समय में परिणाम बता देगा।
ऐप के काम करने का तरीका
यह एआई आधारित ऐप मोबाइल के जरिए मरीजों की खांसी को रिकॉर्ड करता है। दिल्ली एम्स के डॉक्टर हर्षल रमेश साल्वे ने बताया कि जिस तरह डॉक्टर स्टेथोस्कोप लगाकर मरीजों की धड़कनों को सुनते हैं, वैसे ही यह तकनीक खांसी की आवाज की बारीकियों को समझती है और खांसी के साथ मरीज के लक्षणों को मिलाकर एक हेल्थ स्कोर देती है।
मरीजों को मिलेंगे ये फायदे
1. तेज और आसान जांच: 8मिनट में रिपोर्ट, बिना अस्पताल के चक्कर लगाए।
2. सस्ती और पहुंच योग्य: ग्रामीण क्षेत्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC), आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में स्वास्थ्य कार्यकर्ता आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं।
3. समय पर इलाज: शुरुआती चरण में बीमारी पकड़ में आने से गंभीर जटिलताएं टल सकती हैं। भारत में अस्थमा और सीओपीडी लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं, खासकर प्रदूषण वाले शहरों और गांवों में।
4. गैर-आक्रामक: कोई इंजेक्शन, ब्लड टेस्ट या रेडिएशन नहीं।