अमेरिका-ईरान में समझौता विफल होने पर कच्चे तेल की कीमत बढ़ी, देश में महंगाई बढ़ने के आसार!
भारत जैसे देश, जो अपनी तेल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं,
नई दिल्ली। अमेरिका ईरान में समझौता न होने पर कच्चे तेल की कीमत बढ़ी है। इसके चलते देश में फिर से महंगाई बढ़ने के आसार बन गए हैं। अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता बेनतीजा रहने के अगले ही दिन तेल की कीमतों पर इसका असर दिखने लगा है। फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने से पहले लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर यह कभी-कभी 119 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर चला गया था।
कीमत आठ प्रतिशत बढ़कर 104.24 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई
अमेरिका द्वारा सोमवार से ईरान के बंदरगाहों को नाकाबंदी करने की घोषणा के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। शुरुआती कारोबार में रविवार को अमेरिकी क्रूड ऑयल की कीमत आठ प्रतिशत बढ़कर 104.24 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। वहीं, अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत सात प्रतिशत बढ़कर 102.29 डॉलर प्रति बैरल हो गई। यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतों में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखा गया है।
जहाजों के खिलाफ निष्पक्ष रूप से लागू की जाएगी
शांति वार्ता से पहले शुक्रवार को जून डिलीवरी के लिए ब्रेंट 0.8 प्रतिशत गिरकर 95.20 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था। ईरान लंबे समय से वैश्विक तेल शिपिंग के लिए महत्वपूर्ण जलमार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य पर प्रभावी नियंत्रण रखता आया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, यह नाकाबंदी ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करने या वहां से निकलने वाले सभी देशों के जहाजों के खिलाफ निष्पक्ष रूप से लागू की जाएगी। हालांकि, यह उन जहाजों को पारगमन की अनुमति देगा, जो गैर-ईरानी बंदरगाहों के बीच यात्रा कर रहे हैं। दुनिया के व्यापारिक तेल का लगभग पांचवां हिस्सा हर दिन होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।
40 से अधिक वाणिज्यिक जहाजों ने इस मार्ग से आवागमन किया
सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और ईरान जैसे प्रमुख तेल निर्यातक देश इसी मार्ग पर निर्भर हैं। युद्धविराम के बाद के दिनों में भी होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही सीमित रही है। मरीन ट्रैकर्स के अनुसार, युद्धविराम की शुरुआत के बाद से 40 से अधिक वाणिज्यिक जहाजों ने इस मार्ग से आवागमन किया है। अमेरिका नाकाबंदी की घोषणा के बाद इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों की संख्या और भी प्रभावित होने की आशंका है। कच्चे तेल की कीमतों में यह वृद्धि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यह मुद्रास्फीति को बढ़ा सकती है और विभिन्न देशों की आर्थिक विकास दर को प्रभावित कर सकती है। विशेष रूप से भारत जैसे देश, जो अपनी तेल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं, इस स्थिति से सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं।