देश के पहले इच्छामृत्यु पाने वाले हरीश राणा को दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में दी गई अंतिम विदाई! जानें कौन-कौन रहे मौजूद
पिता को बेटे की अर्थी को कंधा देना पड़ता है। कठिन घड़ी में सोसायटी परिवार के साथ खड़ी है।
नई दिल्ली। देश के पहले इच्छामृत्यु पाने वाले हरीश राणा को दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित श्मशान घाट में अंतिम विदाई दी गई। हरीश राणा को अंतिम विदाई देने के लिए उनके परिवार के लोग और रिश्तेदार पहुंचे। इस दौरान सभी की आंखें नम रहीं। पिता भी अपने आंसू को नहीं रोक पाए। अंतिम संस्कार के दौरान चारों तरफ बस हरीश राणा की ही बात चल रही थी। इससे पहले एम्स के अस्पताल से हरीश राणा के शव को परिजनों को सौंप दिया था।
जन्म से लेकर अंतिम यात्रा तक संघर्ष भरा रहा
दक्षिण दिल्ली स्थित ग्रीन पार्क क्षेत्र में बुधवार को अंतिम संस्कार के दौरान पिता अशोक राणा के करीबी मित्र दीपांशु मित्तल ने बताया कि हरीश का जीवन जन्म से लेकर अंतिम यात्रा तक संघर्ष भरा रहा। दिल्ली में जन्मे हरीश पढ़ाई के दौरान चंडीगढ़ में हादसे का शिकार हुए और अब उनकी अंतिम यात्रा भी दिल्ली में ही पूरी हुई। बीते 13 वर्षों का उनका संघर्ष शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है। हरीश राणा की मौत के बाद उनके पिता पूरी तरह टूट गए हैं। उन्होंने अपने बेटे की 13 साल तक सेवा की। उन्हें उम्मीद थी कि उनका बेटा ठीक हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल हुआ था
चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ने के दौरान करीब 13 साल पहले 20 अगस्त 2013 को हरीश राणा हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे। 13 साल बाद भी ठीक ना होने पर माता-पिता ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। 8 जुलाई 2024 को हाई कोर्ट ने इच्छामृत्यु याचिका खारिज की थी। 15 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। 11 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की अनुमति दी। 14 मार्च 2026: हरीश को एम्स, दिल्ली में भर्ती कराया गया।24 मार्च 2026: एम्स में निधन हो गया।
अशोक राणा का संघर्ष किसी योद्धा से कम नहीं
हरीश राणा की मौत के बाद उनके घर के आसपास रहने वाले लोग आपस में चर्चा कर रहे थे। लोगों का कहना है कि किसी पिता का अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगना ही बताता है कि पीड़ा कितनी गहरी रही होगी। उनके अनुसार, अशोक राणा का संघर्ष किसी योद्धा से कम नहीं था, जो वर्षों तक अपने बेटे के लिए लड़ते रहे। उन्होंने कहा कि हरीश भले ही अब इस दुनिया में न हों, लेकिन उनकी कहानी लोगों के जेहन में लंबे समय तक जीवित रहेगी। सोसायटी से भी बड़ी संख्या में लोग अंतिम विदाई देने पहुंचे।