रमजान के महीने में रोजेदारों का इंतकाल होना अच्छा या बुरा, जानें 'रैय्यान' क्या होता है
इस्लाम में रमजान को रहमत, मगफिरत और जहन्नुम से निजात का महीना कहा गया है।
इस्लाम में रमजान को रहमत, मगफिरत और जहन्नुम से निजात का महीना कहा गया है। हदीस में आता है कि जन्नत में रोजेदारों के लिए 'रैय्यान' नाम का एक खास दरवाजा होगा, जिससे सिर्फ रोजा रखने वाले दाखिल होंगे। यही वजह है कि रोजे की हालत में इंतकाल को रहमत माना जाता है। इस्लाम में रमजान को वाकई रहमत (अल्लाह की कृपा), मगफिरत (गुनाहों की माफी) और जहन्नुम से निजात (छुटकारे) का महीना कहा गया है।
रमजान – रहमत, मगफिरत और निजात का महीना
एक मशहूर हदीस में लिखा है कि रमजान का पहला अशरा रहमत है, दूसरा अशरा मगफिरत है और तीसरा अशरा जहन्नुम से आज़ादी है।
रमजान में जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं। जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं।
शैतानों को कैद कर दिया जाता है। यह महीना बंदे और उसके रब के बीच रिश्ते को मजबूत करने का सुनहरा मौका होता है।
जन्नत का खास दरवाजा 'रैय्यान' होता है।
सहीह अल-बुखारी और सहीह मुस्लिम में हदीस के अनुसार
जन्नत में एक दरवाजा है जिसे रैय्यान कहा जाता है। कियामत के दिन उससे सिर्फ रोजेदार दाखिल होंगे। उनके सिवा कोई और उस दरवाजे से दाखिल नहीं होगा।
रैय्यान का मतलब है, खूब सैराब करने वाला (यानी प्यास बुझाने वाला)। रोजा रखने वाला दुनियावी प्यास सहता है और आखिर में उसे खास इनाम मिलता है।
रोजे की हालत में इंतकाल (वफात) होना
इस्लामी रिवायतों में आता है कि अगर किसी शख्स का इंतकाल इबादत की हालत में हो – जैसे रोजा, नमाज या हज तो यह बहुत बड़ी खुशकिस्मती मानी जाती है।
रोजे की हालत में वफात को रहमत इसलिए समझा जाता है क्योंकि बंदा इबादत की हालत में अल्लाह से मिलता है।
वह सब्र और तकवा की हालत में होता है। रमजान में नेकी का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है। हालांकि असल मामला अल्लाह के हाथ में है, वही बेहतर जानता है कि किसका अंजाम कैसा होगा।