कर्ण और राजा बलि नहीं बल्कि ये महर्षि कहलाते हैं महादानी, जानें क्या है कथा
नई दिल्ली। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, दानवीरता की जब भी बात आती है तो कर्ण और राजा बलि का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, लेकिन महर्षि दधीचि को सबसे बड़ा दानी माना जाता है क्योंकि उन्होंने जीवित रहते हुए अपनी हड्डियों का दान कर दिया था।
क्या है पौराणिक कथा
हिंदू धर्म शास्त्रों और ग्रंथों में महर्षि दधीचि को महादानी कहा गया है।महर्षि दधीचि की माता का नाम चित्ति और पिता का नाम अथर्वा था। उन्होंने अपना पूरा जीवन शिव भक्ति को सौंप दिया था। वो वेद शास्त्रों आदि के पूर्ण ज्ञाता थे।महर्षि दधीचि ने लोकहित के लिए कठोर तप किया था। उनके तप की वजह से इंद्र देव के मन में अनावश्यक डर पैदा हो गया था। तप और ध्यान के कारण महर्षि दधीचि के तेज से तीनों लोक आलोकित हो उठे थे। उधर इंद्र देव के तेज में दिन-ब-दिन कमी आ रही थी।
इससे इंद्र देव महर्षि दधीचि से ईर्ष्या रखने लगे। यही नहीं इंद्र ने महर्षि दधीचि की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव और एक अप्सरा को उनके पास भेजा, लेकिन वो उनका तप भंग करने में सफल न हो सके। इसके बाद इंद्र उनकी हत्या के इरादे से सेना लेकर पहुंचे, लेकिन उनके अस्त्र-शस्त्र महर्षि की तप के अभेद्य कवच को भेदने में विफल रहे। अंत में इंद्र स्वर्ग लौट गए। इस घटना के कुछ समय बाद वृत्रासुर नाम के एक असुर ने देवलोक पर कब्जा करके सभी देवताओं को बाहर निकाल दिया।
क्यों कहलाया महादान?
इसके बाद सभी देवता अपनी व्यथा लेकर ब्रह्मा जी के पास गए। तब ब्रह्मा जी ने उनको बताया कि अगर महर्षि दधीचि अपनी अस्थियों का दान कर दें तो उन अस्थियों से एक वज्र बनाकर वृत्रासुर का अंत किया जा सकता है। फिर कतराते हुए देवराज इंद्र महर्षि दधीचि के पास पहुंचे और झिझकते हुए लेकिन तीनों लोकों के मंगल के लिए उनसे उनकी अस्थियां मांगी। इस पर महर्षि मानव और देव जाति के हित के लिए अपनी अस्थियां दान देने के लिए तैयार हो गए। महर्षि ने योग विद्या से अपना शरीर त्याग दिया। फिर उनकी अस्थियों से ‘तेजवान’ नामक व्रज बनाया गया। इसी व्रज से इंद्र देव ने वृत्रासुर का अंत किया और तीनों लोकों को उसके भय और आतंक से मुक्त कराया। साथ ही देवताओं को देवलोक फिर से मिल गया।