दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में 108 फीट ऊंची मूर्ति की आज प्राण प्रतिष्ठा, 300 संत और महंत बनेंगे साक्षी

यह प्रतिमा भगवान स्वामीनारायण के 11 वर्ष की आयु के 'नीलकंठ वर्णी' स्वरूप को दर्शाती है, जब उन्होंने भारत भर में 7 साल की कठिन तपस्या और यात्रा की थी।

Update: 2026-03-26 05:24 GMT

नई दिल्ली। आज का दिन दिल्ली के लिए एक ऐतिहासिक दिन है। दरअसल आज स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर में तपोमूर्ति श्री नीलकंठ वर्णी (भगवान स्वामीनारायण) की 108 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की जा रही है। पंचधातु से बनी यह मूर्ति विश्व में अपनी तरह की पहली मूर्ति है, जिसमें भगवान को एक पैर पर खड़े होकर तपस्या करते हुए दर्शाया गया है। इस अवसर पर विश्व शांति, एकता और सद्भाव के लिए 'श्री नीलकंठ वर्णी विश्व शांति महायज्ञ' का आयोजन भी किया गया है। समारोह में भाग लेने के लिए अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया भर से लगभग 300 संत और महंत दिल्ली पहुंचे हैं।

प्रतिमा की विशेषताएं 

-  यह प्रतिमा भगवान स्वामीनारायण के 11 वर्ष की आयु के 'नीलकंठ वर्णी' स्वरूप को दर्शाती है, जब उन्होंने भारत भर में 7 साल की कठिन तपस्या और यात्रा की थी।

- यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है जो एक पैर पर खड़ी मुद्रा में है, जो मुक्तिनाथ (नेपाल) में उनके कठिन तप का प्रतीक है।

-  प्रतिमा पंचधातु (मुख्यतः कांस्य) से बनी है और इसे 8 फीट ऊंचे चबूतरे पर स्थापित किया गया है, जिससे इसकी कुल ऊंचाई 116 फीट हो जाती है।

कौन हैं तपोमूर्ति नीलकंठ वर्णी?

भगवान स्वामीनारायण ने मात्र 11 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर मानव कल्याण के लिए पूरे भारत में आध्यात्मिक यात्रा शुरू की थीं। सात वर्षों में उन्होंने करीब 12,000 किलोमीटर की यात्रा की और हिमालय, बद्रीनाथ, केदारनाथ, कैलाश-मानसरोवर, मुक्तिनाथ (नेपाल), कामाख्या, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, नासिक, पंढरपुर और द्वारका जैसे तीर्थों का भ्रमण किया। इस दौरान उन्हें 'नीलकंठ वर्णी' के नाम से जाना गया।




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