नई दिल्ली। आम चुनावों में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रचंड जीत भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें जीत की बधाई देते हुए एक 'लोकतांत्रिक और समावेशी' बांग्लादेश के लिए भारत के समर्थन की पुष्टि की है।
द्विपक्षीय संबंधों का 'रीसेट'
पिछले 15 वर्षों से भारत के संबंध शेख हसीना की अवामी लीग के साथ बेहद प्रगाढ़ रहे थे। तारिक रहमान की जीत के साथ, भारत को अब एक ऐसी सरकार के साथ "संबंधों को रीसेट" करना होगा जो 'बांग्लादेश फर्स्ट' की नीति और समानता के आधार पर रिश्तों की वकालत करती है।
सुरक्षा और सीमा प्रबंधन
अतीत में (2001-2006) तारिक रहमान के कार्यकाल के दौरान भारत विरोधी समूहों (जैसे ULFA) को शरण मिलने की घटनाओं ने अविश्वास पैदा किया था। अब भारत यह बारीकी से देखेगा कि नई सरकार उग्रवाद और सीमा पार तस्करी पर क्या रुख अपनाती है।
शेख हसीना का मुद्दा
शेख हसीना वर्तमान में भारत में शरण लिए हुए हैं। बीएनपी नेताओं ने संकेत दिया है कि उनका भारत में रहना द्विपक्षीय संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है और वे उनके प्रत्यर्पण (Extradition) की मांग कर सकते हैं।
चीन और क्षेत्रीय संतुलन
विशेषज्ञों का मानना है कि तारिक रहमान एक संतुलित विदेश नीति अपना सकते हैं, जिसमें चीन के साथ संबंधों को और मजबूती मिल सकती है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह बांग्लादेश में अपने रणनीतिक हितों और प्रभाव को बनाए रखे।
कनेक्टिविटी और व्यापार
बांग्लादेश भारत का एशिया में सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है। तारिक रहमान ने संकेत दिया है कि वे व्यापारिक और आर्थिक विकास के लिए भारत के साथ सहयोग जारी रखेंगे, हालांकि वे तीस्ता जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर अधिक मुखर हो सकते हैं।
अल्पसंख्यकों की सुरक्षा
तारिक रहमान ने अपनी वापसी के बाद हिंदू-मुस्लिम एकजुटता और एक समावेशी बांग्लादेश की बात की है। भारत के लिए वहां के अल्पसंख्यक समुदाय (विशेषकर हिंदुओं) की सुरक्षा और उनके हितों की रक्षा एक संवेदनशील और प्राथमिकता वाला विषय रहेगा।