लिंग के रूप में क्यों की जाती है भगवान शिव की पूजा, जानें इसके पीछे का रहस्य?

Update: 2026-02-12 02:30 GMT

नई दिल्ली। महाशिरात्रि, सावन के महीने, प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि जैसे व्रतों पर शिवलिंग का विधिपूर्वक जलाभिषेक किया जाता है, लेकिन कभी आपने सोचा है कि महादेव की पूजा लिंग के रूप में क्यों की जाती है? भगवान शिव की पूजा 'लिंग' के रूप में की जाने के पीछे गहरा आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और पौराणिक रहस्य छिपा है। संस्कृत में "लिंग" का अर्थ प्रतीक या चिह्न होता है।

निराकार स्वरूप का प्रतीक: शिव को "अनादि" और "अनंत" माना जाता है, जिनका न कोई आदि है और न ही अंत। शिवलिंग उनके निराकार (बिना किसी आकार के) और सर्वव्यापी स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है।

सृष्टि का उद्गम और लय: "लिंग" शब्द दो संस्कृत मूलों से बना है— 'ली' (लीं होना/विलीन होना) और 'गम' (उत्पन्न होना)। यह दर्शाता है कि समस्त ब्रह्मांड इसी परम ऊर्जा से उत्पन्न होता है और अंत में इसी में विलीन हो जाता है।

शिव-शक्ति का मिलन: शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा (लिंग) भगवान शिव (पुरुष/चेतना) का प्रतीक है, और निचला हिस्सा (योनि/पीठम) माता शक्ति (प्रकृति/ऊर्जा) का प्रतीक है। यह संगम दर्शाता है कि पूरी सृष्टि चेतना और शक्ति के संतुलन से बनी है।

ब्रह्मांडीय अंडा: वैज्ञानिक दृष्टि से भी, शिवलिंग का आकार ब्रह्मांडीय अंडे जैसा है, जिसे 'ब्रह्मांड' कहा जाता है। यह ऊर्जा के उस पुंज को दर्शाता है जिससे गैलेक्सियों और ग्रहों का निर्माण हुआ है।

शिवलिंग की उत्पत्ति कैसे हुई?

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी और श्री हरि विष्णु में इस बात को लेकर विवाद हो गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है? दोनों अपने-अपने को श्रेष्ठ बता रहे थे। तभी एक लिंग प्रकट हुआ। इसके बाद दोनों देवताओं से उसके छोर को तलाश करने की कोशिश की, लेकिन हजारों साल बाद भी उस शिवलिंग का स्रोत न मिला। तब ब्रह्मा जी द्वारा प्रकाश स्तंभ से पूछने पर जवाब आया कि वो शिव हैं।

उनसे ही सभी स्रोत उत्पन्न हुए हैं. यहां तक ब्रह्मा और विष्णु भी इसी से उत्पन्न हुए हैं। कहते हैं इसके बाद ही भगवान शिव निराकार रूप में शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए। सबसे पहले भगवान ब्रह्मा और विष्णु ने शिव के उस लिंग की पूजा-अर्चना की। तभी से शिवलिंग की पूजा की परंपरा शुरू हो गई।

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