लोहड़ी का पर्व! जानें इसके पीछे का इतिहास और दुल्ला-भट्टी की कहानी का महत्व
नई दिल्ली। लोहड़ी उत्तर भारत, खासकर पंजाब का एक प्रमुख त्योहार है जो मकर संक्रांति से ठीक पहले मनाया जाता है। यह त्योहार सर्दियों के अंत, रबी फसलों (गेहूं, सरसों) की कटाई और लंबे, धूप वाले दिनों की शुरुआत का प्रतीक है। जिसमें लोग आग जलाकर, लोकगीत गाकर, भांगड़ा-गिद्दा करते हुए तिल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी और लावा जैसी चीजें खाते-खिलाते हैं, जो समृद्धि और सामुदायिक मेलजोल का उत्सव है।
यह क्यों मनाया जाता है?
फसल का उत्सव: यह सर्दियों की फसलों (रबी) की कटाई की खुशी और कृषि समृद्धि का जश्न मनाता है।
मौसम का स्वागत: यह शीतकालीन संक्रांति के बाद लंबे दिनों और वसंत के आगमन का प्रतीक है।
सूर्य और अग्नि देव की पूजा: लोग सूर्य देव और अग्नि देव को धन्यवाद देते हैं और अच्छी फसल के लिए प्रार्थना करते हैं।
ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व
दुल्ला भट्टी: मुगल काल के एक नायक दुल्ला भट्टी की कहानी से जुड़ा है, जिन्होंने गरीब लड़कियों की मदद की थी।
संत कबीर की पत्नी लोई: कुछ लोग मानते हैं कि 'लोहड़ी' शब्द संत कबीर की पत्नी 'लोई' से आया है।
कैसे मनाते हैं?
अग्नि पूजा: शाम को अलाव (आग) जलाकर उसके चारों ओर घेरा बनाकर बैठते हैं।
खास प्रसाद: आग में तिल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी, लावा (मुरमुरे) और पॉपकॉर्न डालते हैं और प्रसाद के रूप में खाते हैं।
लोकगीत और नृत्य: पारंपरिक पंजाबी लोकगीत गाते हैं और ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा करते हैं।
सामुदायिक जुड़ाव: परिवार और दोस्त एक साथ इकट्ठा होकर खुशियां बांटते हैं।