सहरी से लेकर इफ्तार और फिर तरावीह तक... जानें एक रोजेदार की 24 घंटे कैसे बीतते है?
नई दिल्ली। रमजान के पाक महीने में एक रोजेदार की जिंदगी भक्ति, अनुशासन और धैर्य का एक खूबसूरत मेल होती है। सहरी से लेकर इफ्तार और फिर तरावीह तक, उनके 24 घंटे कुछ इस तरह बीतते हैं।
कैसे बीतते है 24 घंटे
सहरी (सुबह का भोजन): रोज़े की शुरुआत सूरज निकलने से पहले 'सहरी' से होती है। यह भोजन दिन भर ऊर्जा बनाए रखने में मदद करता है। सहरी का समय समाप्त होने से पहले रोज़े की नियत (दुआ) की जाती है।
फज्र की नमाज: सहरी के बाद रोजेदार फज्र की नमाज अदा करते हैं और कुरान की तिलावत (पाठ) करते हैं।
दिनचर्या और काम: रोजा रखने के बावजूद लोग अपने सामान्य काम, ऑफिस या पढ़ाई जारी रखते हैं। इस दौरान वे न केवल खाने-पीने से बचते हैं, बल्कि बुराई, झूठ और गुस्से से भी परहेज़ करते हैं।
इबादत और नमाज: दिन भर में जोहर और असर की नमाज़ें समय पर पढ़ी जाती हैं। खाली समय में जिक्र (अल्लाह का स्मरण) और दुआओं पर ध्यान दिया जाता है।
इफ्तार (रोजा खोलना): शाम को सूर्यास्त के समय मगरिब की अज़ान के साथ रोज़ा खोला जाता है। खजूर और पानी से रोज़ा खोलना सुन्नत माना जाता है। रोज़ा खोलते समय विशेष दुआ पढ़ी जाती है।
तरावीह और आराम: रात में इशा की नमाज़ के बाद 'तरावीह' की विशेष लंबी नमाज पढ़ी जाती है, जिसमें कुरान सुना जाता है। इसके बाद रोज़ेदार अगले दिन की सहरी के लिए कुछ देर आराम करते हैं।
दान-पुण्य और नेकी का काम
इस पवित्र महीने में रोजेदार दान करते हैं। जरूरतमंदों की मदद करते हैं। नेकी यानी अच्छा काम करते हैं। आत्म-अनुशासन पर विशेष जोर देते हैं। इस्लाम धर्म में जकात (दान) देना हर संपन्न व्यक्ति के ऊपर फर्ज है, हर साल रमजान के दौरान अपनी कुल कमाई का कम से कम 2.5 फीसद मुसलमानों को दान में देना ही होता है।