छत्तीसगढ़ के इन गांवों में 100 साल से नहीं हुआ होलिका दहन, वजह जानकर दंग रह जाएंगे

Update: 2026-03-02 13:30 GMT

देश में होली के एक दिन पहले होलिका दहन मनाया जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के कई गांवों में 100 साल से भी अधिक समय से होलिका दहन नहीं करने की अनोखी परंपरा चली आ रही है। इसके पीछे मुख्य रूप से देवीय आदेश, पुराने हादसे और धार्मिक मान्यताएं जिम्मेदार हैं।

ग्राम चंदनबिरही (बालोद): 100 वर्षों से मौन

इस गांव में वर्ष 1926 से होलिका दहन बंद है। मान्यता है कि पहले फाल्गुन महीने में प्रसव होने पर नवजात शिशु जीवित नहीं बचते थे। दहन के बदले यहां रामनाम अखंड सप्ताह यज्ञ का आयोजन किया जाता है, जिसके इस वर्ष (2026) 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

ग्राम खरहरी (कोरबा): 150 सालों से रंगों से तौबा

लगभग 150 साल पहले होलिका दहन के दौरान गांव में भीषण आग लग गई थी जिससे पूरा गांव तबाह हो गया था। इसके पीछे ग्रामीणों का मानना है कि देवी मड़वारानी ने सपने में आकर होली न मनाने का आदेश दिया था। एक बार किसी ने परंपरा तोड़ने की कोशिश की तो उसकी रहस्यमय मृत्यु हो गई, जिससे डर और गहरा गया।

ग्राम खजुरपदर (गरियाबंद): देवी प्रकोप का डर

बता दें कि यहां के लोग पिछले 100 सालों से होली नहीं मनाते। ग्रामीणों के अनुसार, गांव की देवियां (श्रीमाटी और शानपाठ देवी) को रंग-गुलाल पसंद नहीं है। ऐसी मान्यता है कि होली खेलने से देवी नाराज हो जाती हैं और गांव पर विपदा आ सकती है, इसलिए लोग इस दिन घरों में रहकर केवल पूजा-अर्चना करते हैं।

ग्राम तेलीनसत्ती (धमतरी): 900 सालों की परंपरा

यहां मान्यता है कि सती माता ने गांव में किसी भी प्रकार का दहन (होलिका, रावण या शव दहन) करने से मना किया है। वहीं इस गांव में न केवल होलिका दहन वर्जित है, बल्कि दशहरा पर रावण भी नहीं जलाया जाता और शवों का अंतिम संस्कार भी गांव की सीमा से बाहर किया जाता है। हालांकि दुर्ग जिले के गोंडपेंड्री में भी पिछले 45 सालों से आपसी विवाद और एक पुराने हिंसक हादसे के कारण होलिका दहन नहीं किया जाता 

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