परशुराम ने काट दिया था अपनी माता का गला! फिर पिता से मांगे तीन वरदान, जानें क्या है कहानी
नई दिल्ली। जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु के दस अवतार हैं। जिसमें एक अवतार है भगवान परशुराम। भगवान परशुराम विष्णु जी के छठवें अवतार हैं। परशुराम भगवान का नाम राम था, लेकिन जब भगवान शिव ने उनको एक दिव्य फरसा दिया तो उनका नाम परशुराम पड़ गया। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने अपने पिता ऋषि जमदग्नि की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता रेणुका का वध किया था।
माता का वध करने की परिस्थिति
एक बार माता रेणुका नदी पर जल लेने गई थीं। वहां उन्होंने गंधर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ जल-क्रीड़ा करते देखा। उन्हें देख माता रेणुका का मन कुछ क्षणों के लिए विचलित हो गया, जिससे उन्हें आश्रम लौटने में देरी हो गई। ऋषि जमदग्नि ने अपनी योगशक्ति से रेणुका के मन के इस सूक्ष्म अपराध (मानसिक परपुरुष चिंतन) को जान लिया और वे अत्यंत क्रोधित हो गए। ऋषि ने अपने चारों बड़े पुत्रों को माता का वध करने का आदेश दिया, लेकिन उन्होंने मोहवश इनकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें विवेकहीन (जड़वत) होने का श्राप दे दिया। अंत में ऋषि ने परशुराम को आदेश दिया। परशुराम ने पिता की तपस्या की शक्ति को जानते हुए और यह सोचकर कि पिता प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देंगे, अपने फरसे से माता और अपने चारों भाइयों का सिर काट दिया।
पिता से मांगे गए वरदान
पुत्र की आज्ञाकारिता से प्रसन्न होकर ऋषि जमदग्नि ने परशुराम से वरदान मांगने को कहा। परशुराम ने मुख्य रूप से ये तीन (या कहीं-कहीं अधिक) वरदान मांगे:
माता का पुनर्जीवन: मेरी माता पुनः जीवित हो जाएं। मेरे भाइयों को श्राप से मुक्ति मिले और वे भी पुनर्जीवित हो जाएं।
स्मृति लोप: माता को वध की घटना की कोई स्मृति न रहे और वे बिल्कुल पहले जैसी ही स्नेहपूर्ण हो जाएं।
पाप से मुक्ति: मुझे इस वध के पाप का दोष न लगे।