नई दिल्ली। रमजान को इस्लाम में इबादत का सबसे पवित्र महीना इसलिए माना जाता है क्योंकि इसी महीने में पवित्र कुरआन का अवतरण (नुज़ूल) शुरू हुआ था। यह आत्म-संयम, धैर्य और अल्लाह के प्रति समर्पण का समय है। इसमें सहरी, इफ्तार और तरावीह का विशेष आध्यात्मिक महत्व है।
सहरी: यह सूर्योदय से पहले का भोजन है जो रोज़ा रखने की शक्ति देता है। सुन्नत के अनुसार, सहरी करना बरकत का काम है और यह इस बात का संकल्प (नियत) है कि व्यक्ति केवल अल्लाह की रज़ा के लिए भूखा-प्यासा रहेगा।
इफ्तार: सूर्यास्त के समय रोज़ा खोलना 'इफ्तार' कहलाता है। यह कृतज्ञता (शुक्र) का क्षण है। मान्यता है कि इफ्तार के समय मांगी गई दुआएं कुबूल होती हैं और दूसरों को इफ्तार कराने का सवाब (पुण्य) बहुत अधिक होता है।
तरावीह: यह रमजान की रातों में ईशा की नमाज के बाद पढ़ी जाने वाली विशेष नमाज है। इसमें पूरे महीने के दौरान कुरआन का पाठ सुना और सुनाया जाता है, जिससे मोमिनों का अपने धर्मग्रंथ से गहरा नाता बनता है।
आध्यात्मिक शुद्धि: रमजान का उद्देश्य केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि तकवा (ईश्वर-चेतना) पैदा करना है। यह गरीबों के प्रति सहानुभूति जगाने, आत्म-अनुशासन सीखने और पिछले पापों की क्षमा मांगने का महीना है।
क्यों खास है रमजान का पाक महीना?
इस्लाम धर्म में माना जाता है कि इसी पवित्र महीने में अल्लाह ने हजरत मुहम्मद पर पवित्र किताब कुरान शरीफ का अवतरण किया था. रमजान को सब्र , संयम, आत्म शुद्धि और इंसानियत का महीना कहा जाता है. इस दौरान मुसलमान सूर्योदय से पहले से लेकर सूर्यास्त तक बिना खाए-पीए रोजा रखते हैं. माना जाता है कि इस महीने में की गई इबादत का सवाब (पुण्य) कई गुना बढ़ जाता है। इस महीने में हर नेक काम का बदला कई गुना बढ़ाकर दिया जाता है, इसीलिए इसे 'नेकियों का मौसम' भी कहा जाता है।