आम आदमी की थाली पर फूटा जंग का बम! महंगी हो सकती हैं आलू-प्याज समेत ये सब्जियां
मिडिल ईस्ट के तनाव का असर केवल कोल्ड स्टोरेज तक ही सीमित नहीं है। गैस आपूर्ति प्रभावित होने से देश में यूरिया उत्पादन भी घटा है।
नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट जंग का असर भारत की रसोई घरों तक पहुंच गया है। कच्चे तेल और गैस की किल्लत के बाद अब इसका प्रभाव कृषि क्षेत्र पर दिखने लगा है। दरअसल कोल्ड स्टोरेज में इस्तेमाल होने वाली अमोनिया गैस के दाम बढ़ गए हैं। जिससे सब्जियों के भंडारण की लागत में वृद्धि हो गई है। इसका असर सीधे तौर पर आलू समेत कई सब्जियों की कीमतों पर पड़ने वाला है। इससे किसानों की आमदनी भी प्रभावित हो सकती है।
कोल्ड स्टोरेज की बढ़ी लागत
दरअसल कोल्ड स्टोरेज में तापमान बनाए रखने के लिए अमोनिया गैस बेहद जरूरी होती है। इसी के जरिए आलू और अन्य सब्जियों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता है। लेकिन हाल के दिनों में अमोनिया की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। जानकारी के अनुसार, अमोनिया गैस की कीमत करीब 75 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 110 रुपये प्रति तक पहुंच गई है। इस बढ़ोतरी से कोल्ड स्टोरेज संचालकों की लागत काफी बढ़ गई है। जब स्टोरेज महंगा होता है तो उसका असर सीधे किसानों और बाजार कीमतों को प्रभावित करता है।
किसानों पर पड़ेगा बोझ
किसानों के लिए पहले से ही उत्पादन की चुनौतियां बनी हुई है, अब यह स्थिति और मुश्किल हो गई है। आलू को अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए किसानों को कोल्ड स्टोरेज पर निर्भर रहना पड़ता है, लेकिन अब लागत बढ़ने से उनकी कमाई पर असर पड़ा है। कोल्ड स्टोरेज संचालकों ने कहा कि गैस के महंगे होने के साथ ही बिजली और मजदूरी की लागत भी बढ़ रही है, जिससे भंडारण शुल्क बढ़ाने की नौबत आ सकती है। इसका सीधा बोझ किसानों पर पड़ेगा।
सप्लाई पर पड़ेगा असर
अगर कोल्ड स्टोरेज में आलू और दूसरी सब्जियां सुरक्षित नहीं रह पाई तो बाजार में उनकी कमी हो सकती है। ऐसे में कीमतों में तेजी आना तय माना जा रहा है। यही वजह है कि सरकार भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है जिससे सप्लाई प्रभावित न हो। हालांकि, अमोनिया की उपलब्धता सुनिश्चित कर सप्लाई चेन को बनाए रखने की कोशिश भी की गई है, जिससे बड़े नुकसान और महंगाई को टाला जा सके।
यूरिया उत्पादन में भी आई कमी
मिडिल ईस्ट के तनाव का असर केवल कोल्ड स्टोरेज तक ही सीमित नहीं है। गैस आपूर्ति प्रभावित होने से देश में यूरिया उत्पादन भी घटा है। सामान्य स्तर की तुलना में उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई हैष। ऐसी स्थिति में उर्वरकों की कीमतों और सब्सिडी पर भी दबाव बनने का डर है, जिसका असर खेती की लागत पर पड़ सकता है।