तीसरी दुनिया के देशों पर ट्रंप का निशाना, अमेरिका में नो-एंट्री पॉलिसी की शुरुआत; क्या भारत भी इस सूची में है?
ट्रंप के अनुसार, इन देशों से आने वाला माइग्रेशन अमेरिकी सुरक्षा और प्रशासनिक ढांचे पर भारी बोझ बन रहा है, इसलिए अब इस पर सख्ती जरूरी है।;
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी आव्रजन नीति की ओर खींच लिया है। उन्होंने घोषणा की है कि वे उन देशों के नागरिकों को अमेरिका में प्रवेश करने से रोकने की तैयारी कर रहे हैं, जिन्हें वह तीसरी दुनिया के देश मानते हैं। ट्रंप के अनुसार, इन देशों से आने वाला माइग्रेशन अमेरिकी सुरक्षा और प्रशासनिक ढांचे पर भारी बोझ बन रहा है, इसलिए अब इस पर सख्ती जरूरी है। यह ऐलान उस घटना के तुरंत बाद किया गया जब एक अफगानी नागरिक ने वॉशिंगटन में दो नेशनल गार्ड सैनिकों पर गोली चला दी। इस घटना ने अमेरिका में सुरक्षा संबंधी चिंताओं को और बढ़ा दिया, जिसके चलते ट्रंप ने माइग्रेशन नीति पर कड़ा रुख अपनाया।
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए लिखा कि अब समय आ गया है जब तीसरी दुनिया के देशों से आने वाले लोगों पर रोक लगा दी जाए, ताकि अमेरिका अपने सिस्टम को फिर से स्थिर कर सके। उन्होंने दावा किया कि पिछली सरकारों की गलत नीतियों की वजह से अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ा है और अब यह नीति अमेरिकी जनता के हित में बदली जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि 27 नवंबर 2025 से दायर होने वाली सभी इमिग्रेशन और ग्रीन कार्ड से जुड़ी याचिकाओं की गहन समीक्षा की जाएगी, ताकि कोई भी संदिग्ध या जोखिम वाला व्यक्ति अमेरिका में प्रवेश न कर सके। अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा (USCIS) के निदेशक जोसेफ एडलो ने भी इस नीति का समर्थन करते हुए कहा कि देश की सुरक्षा सर्वोपरि है और अमेरिकियों को पिछली नीतियों की कीमत नहीं चुकानी चाहिए।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर वे देश कौन-से हैं जिन्हें ट्रंप तीसरी दुनिया की श्रेणी में रखते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस सूची में भारत का नाम नहीं है। ट्रंप की नजर जिन देशों पर है, उनमें अफगानिस्तान, म्यांमार, बुरुंडी, चाड, कांगो गणराज्य, क्यूबा, इक्वेटोरियल गिनी, इरिट्रिया, हैती, ईरान, लाओस, लीबिया, सिएरा लियोन, सोमालिया, सूडान, टोगो, तुर्कमेनिस्तान, वेनेजुएला और यमन जैसे देश शामिल हैं। इन देशों को ट्रंप प्रशासन यात्रा प्रतिबंध और संभावित माइग्रेशन खतरे वाले देशों की श्रेणी में रखता है।
तीसरी दुनिया की अवधारणा की जड़ें कोल्ड वॉर के दौर में हैं, जब दुनिया को तीन भागों में बांटा गया था। पहली दुनिया में अमेरिका और उसके सहयोगी विकसित देश थे, दूसरी दुनिया में सोवियत संघ और उसके साम्यवादी सहयोगी, जबकि जो देश इन दोनों गुटों में शामिल नहीं थे और आर्थिक रूप से कमजोर थे, उन्हें तीसरी दुनिया कहा गया। समय के साथ यह शब्द विवादास्पद हो गया और आज इसे विकासशील देशों के लिए उपयोग किया जाने लगा है, हालांकि कई विशेषज्ञ इसे अपमानजनक मानते हैं।
ट्रंप के बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसे अमेरिका की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम मानते हैं, जबकि कई देशों का मानना है कि यह उन देशों के नागरिकों के साथ भेदभाव है, जो बेहतर भविष्य की तलाश में अमेरिका की ओर देखते हैं। भारत को इस सूची में शामिल न किए जाने को विशेषज्ञ इस बात का संकेत मानते हैं कि भारत को वैश्विक स्तर पर एक उभरते हुए आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है, न कि कमजोर या अविकसित राष्ट्र के रूप में। आने वाले समय में यह देखने वाली बात होगी कि ट्रंप की यह नीति विश्व मंच पर नए भू-राजनीतिक समीकरण पैदा करती है या सिर्फ अमेरिकी राजनीति का एक और विवादित अध्याय बनकर रह जाती है।