हरीश राणा को तो सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु के लिए मंजूरी दे दी लेकिन जानें अरुणा शानबाग और कॉमन कॉज मामले में क्या हुआ था

Update: 2026-03-11 09:00 GMT

नई दिल्ली। आज सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। दरअसल 31 वर्षीय हरीश राणा के परिवार द्वारा दायर उस याचिका पर अपना निर्णय सुना दिया है जिसमें उनके लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट को वापस लेने की अनुमति मांगी गई है। बता दें कि कोर्ट ने इच्छामृत्यु के लिए मंजूरी दे दी है। लेकिन अरुणा शानबाग, कॉमन कॉज जैसे केस ने मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने 'पैसिव यूथेनेशिया' (निष्क्रिय इच्छा मृत्यु) और 'लिविंग विल' को कानूनी मान्यता दी है।

अरुणा शानबाग मामला (2011)

सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव यूथेनेशिया (जीवन रक्षक प्रणाली को हटाना) को वैध बनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि अरुणा को इच्छामृत्यु नहीं दी गई, लेकिन लाइलाज मरीजों के लिए मेडिकल बोर्ड की देखरेख में जीवन रक्षक उपकरण हटाने की गाइडलाइंस जारी की गई।  अरुणा शानबाग मुंबई के  किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में नर्स थीं। रिपोर्ट के अनुसार, साल 1973 में अस्पताल के सफाईकर्मी द्वारा रेप और कुत्ते की चेन से गला घोंटकर हत्या किए जाने के बाद अरुणा शानबाग को गंभीर मानसिक क्षति हुई और वह कोमा जैसी स्थिति में चली गईं।

कॉमन कॉज मामला (2018)

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इसे और स्पष्ट करते हुए 'निजी इच्छा' या 'लिविंग विल' को मान्यता दी। इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति पहले ही यह लिखित निर्देश दे सकता है कि लाइलाज स्थिति में उसे कृत्रिम रूप से जीवित न रखा जाए।

हरीश राणा मामला (2026)

यह हालिया मामला है, जिसमें 13 वर्षों से कोमा में रहने वाले 31 वर्षीय हरीश राणा के परिवार की याचिका पर, सर्वोच्च न्यायालय ने उनके जीवन रक्षक सिस्टम को हटाने की अनुमति दी, जो पैसिव यूथेनेशिया का एक और बड़ा कानूनी उदाहरण बना।

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