शिव-शक्ति का मिलन! जानें संसार के पहले प्रेम विवाह की वो कहानी जब शिव को मिली उनकी अर्द्धांगिनी

Update: 2026-02-15 02:30 GMT

नई दिल्ली। महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के उपलक्ष्य में मनाई जाती है, जो शिव-शक्ति के मिलन और वैराग्य से गृहस्थ जीवन में प्रवेश का प्रतीक है। इस दिन शिवजी का रुद्राभिषेक, विशेष पूजा और रात में जागरण किया जाता है, जिसे बेहद फलदायी माना जाता है।

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है?

शिव-पार्वती विवाह: मान्यता है कि इसी पावन रात्रि को महादेव और माता पार्वती परिणय सूत्र में बंधे थे।

शिवलिंग का प्राकट्य: शिवपुराण के अनुसार, इसी रात भगवान शिव निराकार से साकार रूप में शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे।

दिव्य नृत्य: इस रात भगवान शिव ने तांडव यानी अपना दिव्य नृत्य किया था।

आस्था का पर्व: भक्त इस दिन व्रत रखकर भोलेनाथ की पूजा करते हैं ताकि कष्ट दूर हों और मनोकामनाएं पूरी हों।

शिवजी और माता पार्वती की कहानी

माता सती के देह त्यागने के बाद, भगवान शिव गहरे दुख और समाधि में चले गए थे। सती ने हिमालय राज के घर पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। वे बचपन से ही शिवजी को पति रूप में चाहती थीं।  शिवजी को पाने के लिए माता पार्वती ने वर्षों तक अन्न-जल त्यागकर कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को देवों की उपस्थिति में शिवजी ने वैराग्य छोड़कर पार्वती जी से विवाह किया। इस पवित्र दिन पर शिवलिंग पर जलाभिषेक, बेलपत्र और पुष्प अर्पित किए जाते हैं, और रात्रि जागरण के साथ शिव जी की बारात का आयोजन भी कई स्थानों पर होता है।

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