NAVRATRI SPECIAL: आज तीसरे दिन होगी मां के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा, जानें पूजा की विधि और कथा के बारे में

By :  Aryan
Update: 2026-03-20 01:30 GMT

मां चंद्रघंटा की पूजा नवरात्रि के तीसरे दिन की जाती है। यह देवी दुर्गा का करुणामयी स्वरूप है, जो साहस, शांति और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिस कारण इन्हें 'चंद्रघंटा' कहा जाता है। माता का रंग सुनहरा है और वे दस हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडलु आदि धारण करती हैं और सिंह (शेर) पर सवार होती हैं। देवी चंद्रघंटा की पूजा से साधक को नकारात्मकता से मुक्ति मिलती है और मन में साहस व एकाग्रता आती है।

पूजा विधि

प्रातः स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें।

पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें।

मां चंद्रघंटा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

पीले या सुनहरे रंग के फूल अर्पित करें।

रोली, अक्षत, चंदन और धूप-दीप से पूजा करें।

दूध, खीर या मिठाई का भोग लगाएं।

अंत में मां की आरती करें और शांति व साहस की प्रार्थना करें।

भोग

माता को दूध या दूध से बनी वस्तुओं का भोग लगाना शुभ माना जाता है

 मंत्र

ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः॥

या

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघंटेति विश्रुता॥

 महत्व

मां चंद्रघंटा के मस्तक पर अर्धचंद्र (घंटा के आकार का) होता है, इसलिए इन्हें यह नाम मिला। इनकी पूजा करने से भय और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

आत्मविश्वास और वीरता बढ़ती है।

जीवन में शांति और सुख आता है।

मां चंद्रघंटा की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस ने जब देवताओं पर अत्याचार बढ़ा दिए और इंद्रदेव का सिंहासन छीनना चाहा, तब माता पार्वती ने दुष्टों के संहार के लिए यह रूप धारण किया। महिषासुर का वध करने के लिए माता ने दस भुजाओं वाला सिंहवाहिनी स्वरूप लिया, जिसके बाद उनके घंटे की ध्वनि से ही असुरों का नाश हुआ और देवताओं को विजय मिली।

विवाह से जुड़ी कथा

एक अन्य कथा के अनुसार, जब भगवान शिव, माता पार्वती से विवाह करने आए तो उनके भयानक रूप (भूत-प्रेत के साथ) को देखकर पार्वती की माता और रिश्तेदार डर गए। माता पार्वती ने उस समय मां चंद्रघंटा का रूप धारण कर अपने परिवार की रक्षा की और शिवजी को एक सुंदर और सौम्य रूप में आने के लिए राजी किया।



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