वीर सावरकर पुण्यतिथि: भारत का सबसे विवादित स्वतंत्रता सेनानी! काटी काला पानी की सजा, जानें भारत की आजादी में क्या है सावरकर का योगदान
नई दिल्ली। आज वीर सावरकर की 60वीं पुण्यतिथि है। 1966 में आज ही के दिन 83 साल के वीर सावरकर ने मुंबई में आखिरी सांस ली थी। विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें 'वीर सावरकर' के नाम से जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अत्यंत प्रभावशाली और विवादास्पद व्यक्तित्व रहे हैं। उनका जीवन साहस, संघर्ष और राष्ट्रवाद की एक ऐसी गाथा है जिसने लंदन से लेकर अंडमान की सेलुलर जेल तक अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी।
कौन थे वीर सावरकर?
विनायक दामोदर सावरकर (28 मई 1883 – 26 फरवरी 1966), जिन्हें वीर सावरकर के नाम से जाना जाता है, भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक और लेखक थे। उन्होंने 'हिंदुत्व' की विचारधारा को प्रतिपादित किया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी मार्ग का समर्थन किया।
1. लंदन में क्रांति का बिगुल: 'फ्री इंडिया सोसाइटी'
सावरकर जब कानून की पढ़ाई करने लंदन गए, तो उन्होंने वहां केवल पढ़ाई नहीं की, बल्कि भारत की आजादी का केंद्र खड़ा कर दिया।
इंडिया हाउस: सावरकर ने लंदन स्थित 'इंडिया हाउस' को क्रांतिकारी गतिविधियों का अड्डा बना दिया। यहाँ वे भारतीय छात्रों को राष्ट्रवाद के लिए प्रेरित करते थे।
1857 का विद्रोह: उन्होंने 'The Indian War of Independence 1857' नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी। इस किताब में उन्होंने 1857 की घटना को महज एक 'सिपाही विद्रोह' न कहकर 'भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' घोषित किया। इस पुस्तक ने ब्रिटिश हुकूमत में डर पैदा कर दिया और इसे प्रकाशित होने से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया।
अभिनव भारत: उन्होंने 'अभिनव भारत सोसाइटी' के माध्यम से युवाओं को संगठित किया और हथियारों के उपयोग व गुरिल्ला युद्ध की शिक्षा पर जोर दिया।
2. समुद्र में छलांग: साहस की मिसाल
जब सावरकर को गिरफ्तार कर भारत लाया जा रहा था, तब उन्होंने साहस का परिचय देते हुए फ्रांस के मार्सिले (Marseilles) बंदरगाह के पास जहाज के शौचालय की खिड़की से समुद्र में छलांग लगा दी थी। हालांकि, उन्हें फिर से पकड़ लिया गया, लेकिन इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए थे।
3. काला पानी: सेलुलर जेल की यातनाएं
सावरकर को नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या की साजिश के आरोप में दोहरे आजीवन कारावास (50 साल) की सजा सुनाई गई और अंडमान की सेलुलर जेल भेज दिया गया। काला पानी की सजा के दौरान उनसे कोल्हू चलवाया जाता था, नारियल की जटाएं कूटी जाती थीं और उन्हें छोटी सी कोठरी में बंद रखा जाता था। उनके पास न कागज था न कलम, फिर भी उन्होंने जेल की दीवारों पर कीलों और कोयले से हजारों कविताएं लिखीं और उन्हें याद किया। इसी जेल के दौरान उनके विचारों में 'हिंदुत्व' की अवधारणा ने जन्म लिया, जो आगे चलकर भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
लेखन कार्य
सावरकर ने प्रसिद्ध पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' लिखी, जिसमें उन्होंने 1857 के विद्रोह को 'भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' घोषित किया। इस पुस्तक को ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था।
हिंदुत्व की विचारधारा
रत्नागिरी में नजरबंदी के दौरान उन्होंने अपनी पुस्तक 'हिंदुत्व' में इस विचारधारा को परिभाषित किया, जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित थी। वे 'अखिल भारतीय हिंदू महासभा' के अध्यक्ष भी रहे।
समाज सुधार
उन्होंने हिंदू समाज से छुआछूत और जातिवाद जैसी कुरीतियों को मिटाने के लिए सक्रिय रूप से काम किया। उन्होंने रत्नागिरी में 'पतित पावन मंदिर' का निर्माण करवाया, जहाँ सभी जातियों के लोगों को प्रवेश की अनुमति थी।
विवाद और सत्य
सावरकर के जीवन से जुड़े कुछ विवाद भी रहे हैं, जैसे जेल से रिहाई के लिए उनके द्वारा लिखे गए दया याचिका (Mercy Petition) पत्र और महात्मा गांधी की हत्या के मामले में उन पर लगा आरोप, जिससे बाद में अदालत ने उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था।