बाबा की नगरी में कैसे शुरू हुई चिता की राख से होली खेलने की परंपरा? जानें इतिहास
काशी। काशी में चिता की राख से होली खेलने की परंपरा, जिसे 'मसान की होली' या 'भस्म होली' कहा जाता है, सदियों पुरानी है। इसकी शुरुआत के पीछे भगवान शिव से जुड़ी एक गहरी धार्मिक मान्यता है:
परंपरा की पौराणिक शुरुआत
रंगभरी एकादशी का उत्सव: मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर विवाह के बाद, भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती का 'गौना' कराकर पहली बार काशी आए थे।
शिव के गणों की अनुपस्थिति: इस खुशी के अवसर पर शिव जी ने देवी-देवताओं और भक्तों के साथ अबीर-गुलाल से होली खेली। लेकिन उनके प्रिय गण—भूत-प्रेत, पिशाच, और अघोरी—इस उत्सव में शामिल नहीं हो पाए थे।
श्मशान में उत्सव
अपने इन विशेष भक्तों को खुश करने के लिए, शिव जी ने अगले दिन महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर उनके साथ होली खेली। चूंकि श्मशान में रंग नहीं थे, इसलिए उन्होंने चिता की भस्म (राख) को रंग के रूप में इस्तेमाल किया।
आध्यात्मिक महत्व
- यह परंपरा दर्शाती है कि काशी में मृत्यु शोक नहीं, बल्कि मोक्ष का उत्सव है।
- चिता की भस्म वैराग्य और इस सत्य का प्रतीक है कि अंत में सब कुछ राख में मिल जाना है।
- यह होली शिव के 'महाकाल' स्वरूप को समर्पित है, जो श्मशान के अधिपति माने जाते हैं।