दिल्ली की कवि गोष्ठियों का बदलता स्वरूप कर रहा है साहित्य प्रेमियों और रचनाकारों को आत्ममंथन के लिए विवश!

Update: 2026-01-06 18:00 GMT

डॉ. चेतन आनंद-(कवि-पत्रकार)

नई दिल्ली। भारत की सांस्कृतिक और साहित्यिक पहचान में दिल्ली का विशेष स्थान रहा है। यहां की कवि गोष्ठियां कभी विचार, संवेदना और सामाजिक सरोकार की जीवंत प्रयोगशालाएं मानी जाती थीं। हिंदी-उर्दू कविता की अनेक धाराएं यहीं से आगे बढ़ीं। परंतु बीते एक दशक में दिल्ली की कवि गोष्ठियों का स्वरूप जिस तेजी से बदला है, उसने साहित्य प्रेमियों और गंभीर रचनाकारों को आत्ममंथन के लिए विवश कर दिया है।

आयोजन की भरमार, विचारों की कमी

आज दिल्ली में लगभग हर सप्ताह सैकड़ों कवि गोष्ठियां होती हैं। सभागारों में, पार्कों में, सोसायटियों में और यहां तक कि रेस्तरां व कैफे में भी। संख्या के इस विस्फोट ने गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। कई आयोजनों में कविता का उद्देश्य आत्म-अभिव्यक्ति न होकर केवल मंच-प्रदर्शन बनकर रह गया है। कविता सुनी कम जाती है, दिखाई अधिक जाती है।

वही चेहरे, वही तालियां

दिल्ली की अनेक कवि गोष्ठियों में वर्षों से घूमते वही परिचित चेहरे दिखाई देते हैं। वही रचनाएँ, वही लय, वही ठहरे हुए मुहावरे। नए और युवा कवियों के लिए मंच सीमित है। अक्सर उन्हें या तो अंतिम समय में बोलने का अवसर मिलता है या बिल्कुल नहीं। इससे साहित्य का स्वाभाविक विकास बाधित होता है और कविता एक बंद दायरे में घूमती रहती है।

श्रोता : रसिक से दर्शक तक

पहले कवि गोष्ठी का श्रोता ‘रसिक’ होता था, जो कविता को सुनता, समझता और आत्मसात करता था। आज वह कई बार ‘दर्शक’ बन गया है, जो तालियां बजाता है, वीडियो बनाता है और सोशल मीडिया पर साझा करता है। गंभीर और विचारोत्तेजक कविताओं के समय बेचैनी दिखती है, जबकि तुकांत, तात्कालिक और चुटीली पंक्तियों पर तुरंत प्रतिक्रिया मिल जाती है।

साहित्य से व्यापार की ओर

दिल्ली की कुछ कवि गोष्ठियां अब आस्था से अधिक आयोजन-व्यवसाय का रूप ले चुकी हैं। कहीं ‘सहयोग राशि’ के नाम पर मंच तक पहुंच सुनिश्चित की जाती है, तो कहीं प्रायोजकों के बैनर कविता से बड़े दिखाई देते हैं। यह स्थिति साहित्य की आत्मा के लिए चिंताजनक है, क्योंकि कविता का मूल्य उसकी संवेदना में होना चाहिए, न कि उसकी मार्केटिंग में।

सोशल मीडिया का दबाव

रील और शॉर्ट वीडियो संस्कृति ने कविता की संरचना तक को प्रभावित किया है। अब कविताएँ इस सोच के साथ लिखी जा रही हैं कि कौन-सी पंक्ति वायरल होगी। गहराई, धैर्य और दीर्घ अनुभूति की जगह त्वरित प्रभाव ने ले ली है। कविता की यात्रा ‘पंक्ति’ तक सिमटती जा रही है।

दिल्ली-एनसीआर की स्थिति

गाजियाबाद, हापुड़ और दिल्ली-एनसीआर के अन्य क्षेत्रों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। यहां मुहल्ला-स्तरीय कवि गोष्ठियां सामाजिक मेल-जोल का माध्यम तो बन रही हैं, पर साहित्यिक कसौटी पर सब खरा नहीं उतरता। प्रतिस्पर्धा अब रचना की नहीं, आयोजन की हो गई है।

आशा की किरण

इस चित्र का दूसरा पहलू भी है। दिल्ली में कुछ संस्थाएं, विश्वविद्यालयों के साहित्यिक मंच और स्वतंत्र समूह आज भी गंभीर कविताओं के लिए स्थान बना रहे हैं। यहां नए रचनाकारों को सुना जाता है, आलोचना होती है और संवाद जीवित रहता है। ये आयोजन कम प्रचारित होते हैं, पर साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान हैं।

क्या किया जाना चाहिए

1.कवि गोष्ठियों में चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो

2.नवोदित कवियों के लिए निश्चित अवसर तय हों

3.श्रोताओं में कविता सुनने की संस्कृति विकसित की जाए

4.कविता को सोशल मीडिया कंटेंट से ऊपर रखा जाए

5.आयोजक साहित्य को उद्देश्य मानें, साधन नहीं

दिल्ली की कवि गोष्ठियां आज एक चौराहे पर खड़ी हैं। एक रास्ता बाजार, भीड़ और तात्कालिक लोकप्रियता की ओर जाता है, दूसरा साहित्यिक ईमानदारी, साधना और संवाद की ओर। यह तय करना कवियों, आयोजकों और श्रोताओं तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि कविता मंच की शोभा भर न बने, बल्कि समाज की चेतना की आवाज बनी रहे।

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