क्या है ईस्टर की कहानी? कैसे पड़ा नाम, जानें इस उत्सव की शुरुआत कब हुई?
नई दिल्ली। ईस्टर 5 अप्रैल यानी रविवार को यीशु मसीह के पुनरुत्थान की खुशी में मनाया जाएगा। ईस्टर का नाम और इसकी शुरुआत की कहानी ईसाई धर्म के सबसे महत्वपूर्ण घटना, यानी प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान से जुड़ी है।
ईस्टर नाम की उत्पत्ति
एंग्लो-सैक्सन देवी 'ईस्त्र' (Eostre): आठवीं शताब्दी के विद्वान और भिक्षु बेडे के अनुसार, "ईस्टर" शब्द एंग्लो-सैक्सन देवी ईस्त्र (Eostre) या ओस्टारा के नाम से आया है। वे वसंत और प्रजनन की देवी मानी जाती थीं, और उनके सम्मान में अप्रैल के महीने (जिसे 'ईस्त्रमोनथ' कहा जाता था) में उत्सव मनाए जाते थे।
जर्मन शब्द 'Ostern': एक अन्य मत के अनुसार, यह पुराने जर्मन शब्द 'Austron' (भोर या सूर्योदय) से निकला है, जो 'पूर्व' दिशा से संबंधित है, जहां से सूरज उगता है।
पास्का (Pascha): अधिकांश अन्य भाषाओं (जैसे फ्रेंच में 'Pâques' या ग्रीक में 'Pascha') में, इस पर्व का नाम हिब्रू शब्द पेसाच या 'पासओवर' से आया है, जो यहूदी गुलामी से मुक्ति का प्रतीक है।
क्या है ईस्टर की कहानी
ईसाई मान्यताओं के अनुसार, गुड फ्राइडे के दिन प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाया गया था। उनके बलिदान के तीसरे दिन, यानी रविवार को, वे अपनी कब्र से पुनर्जीवित हो उठे थे। इस जीत को अधर्म पर धर्म और मृत्यु पर जीवन की विजय के रूप में मनाया जाता है। आज के समय में इस दिन अंडों को सजाने और 'ईस्टर बनी' की परंपराएं भी जुड़ गई हैं, जो नए जीवन और वसंत का प्रतीक हैं।
उत्सव की शुरुआत कब हुई?
ईस्टर मनाने की परंपरा ईसाई धर्म के शुरुआती दौर से ही शुरू हो गई थी।
पहली सदी (50 ईस्वी)
प्रेरित पौलुस के पत्रों में यीशु को "फसह का मेमना" कहकर संबोधित किया गया था, जिससे संकेत मिलता है कि शुरुआती ईसाई पुनरुत्थान को यहूदी फसह के साथ जोड़कर देखते थे。
दूसरी से चौथी सदी
शुरुआत में ईस्टर मनाने की तारीखों को लेकर चर्चों के बीच काफी विवाद था। सम्राट कॉन्स्टेंटाइन के समय में नीकिया की पहली परिषद ने यह तय किया कि ईस्टर हमेशा रविवार को मनाया जाएगा। यह दिन वसंत विषुव (Spring Equinox) के बाद आने वाली पहली पूर्णिमा के बाद वाला रविवार होता है।