डिजिटल पेमेंट मॉडल का भविष्य संकट में...UPI को लेकर आरबीआई ने दी यह चेतावनी!

देश में डिजिटल पेमेंट का बड़ा हिस्सा अब यूपीआई पर टिका हुआ है। कुल मिलाकर डिजिटल लेनदेन का लगभग 85 फीसदी हिस्सा यूपीआई के माध्यम से किया जा रहा है।

Update: 2026-01-18 15:00 GMT

नई दिल्ली। बजट 1 फरवरी को पेश होगा। इस बजट में देश और वित्त मंत्री के सामने सबसे बड़ा सवाल यूपीआई पेमेंट से जुड़ा मुद्दा खड़ा हो गया है। भारत में डिजिटल भुगतान की रफ्तार में काफी तेजी आई है। लेकिन बजट 2026 आने से से पहले यूपीआई को लेकर इसकी समस्याएं सामने आ रही है, जिस पर अब चर्चा शुरू हो गई है।

पेमेंट कंपनियों और बैंकों ने दी चेतावनी 

पेमेंट कंपनियों, बैंकों और फिनटेक फर्मों ने चेतावनी दी है कि यूपीआई के ग्रोथ को समर्थन देने वाला मॉडल तेजी से अस्थिर होता जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड ट्रांजेक्शन, विशेष रूप से कम मूल्य वाले व्यक्ति से व्यापारी पेमेंट्स पर शून्य व्यापारी छूट दर (एमडीआर) पर जोर देने से वित्तीय समावेशन में जरूर इजाफा हुआ है, लेकिन शून्य एमडीआर पॉलिसी का वित्तीय बोझ अब असहनीय होता जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार ऐसे प्रत्येक लेनदेन को प्रोसेस करने में लगभग 2 रुपए का खर्च आता है। यह लागत पूरी तरह से बैंकों और फिनटेक फर्मों द्वारा वहन की जाती है। 

देश में यूपीआई की पकड़ मजबूत

देश में डिजिटल पेमेंट का बड़ा हिस्सा अब यूपीआई पर टिका हुआ है। कुल मिलाकर डिजिटल लेनदेन का लगभग 85 फीसदी हिस्सा यूपीआई के माध्यम से किया जा रहा है। आंकड़ों की बात करें तो, अक्टूबर महीने में ही 20 अरब से ज्यादा ट्रांजैक्शन हुए और करीब 27 लाख करोड़ रुपये का लेनदेन दर्ज किया गया। ये आंकड़े बताते हैं कि यूपीआई कितनी तेजी से लोगों की रोजमर्रा का हिस्सा बन चुका है।

PhonePe ने भी शून्य एमडीआर को कहा गलत

भारत के सबसे बड़े यूपीआई प्लेटफॉर्म PhonePe ने स्वीकार किया कि मौजूदा स्वरूप में शून्य एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) अनिवार्य नियम आर्थिक रूप से सही नहीं है. कंपनी के अनुसार, व्यापक स्तर पर बने रहने के लिए इकोसिस्टम को तत्काल एक अनुमानित कॉस्ट रिकवरी मैकेनिज्म की आवश्यकता है।

आरबीआई की सलाह 

इस पूरे मुद्दे पर आरबीआई गवर्नर ने साफ तौर पर कहा है कि, यूपीआई को हमेशा फ्री में चलाना संभव नहीं है।  इस प्रक्रिया में लगने वाले खर्च को किसी न किसी को तो वहन करना ही होगा। वहीं इस विषय पर कंपनियों का कहना है कि पैसों की कमी के कारण नए फीचर्स लाने और सिस्टम को और अधिक मजबूत बनाने में परेशानी आ रही है।  साथ ही दूर-दराज के गांवों तक यूपीआई को पहुंचाने में भी कठिनाई हो रही है।

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